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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग ३७/४०
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जगत नाम सुनि भ्रम भयौ, मान्यौ सत्य स्वरूप ।
सुन्दर मृग जल देखिये, है सूरय की धूप ॥३७॥
व्यवहार में लोगों की मिथ्या बातें सुन सुनकर हम भ्रम में पड़ते गये और उसे ही सत्य मान बैठे । जैसे कि किसी पशु को मृत्तिका पर सूर्य की किरणें देखकर मृगमरीचिका से जल का भ्रम हो जाता है ॥३७॥
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जैसैं महदाकाश तैं, घटाकाश नहिं भिन्न ।
यौं आतम परमातमा, सुन्दर सदा प्रसन्न ॥३८॥
जैसे महाकाश एवं घटाकाश में कोई भेद नहीं होता, वे दोनों परस्पर एक ही हैं; वैसे ही आत्मा एवं परमात्मा भी सदा स्वच्छ(शुद्ध = प्रसन्न) रहने के कारण परस्पर अभिन्न(एक) ही हैं ॥३८॥
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आतम अरु परमातमा, कहन सुनन कौं दोइ ।
सुन्दर तब ही मुक्त है, जबहिं एकता होइ ॥३९॥
आत्मा एवं परमात्मा - ये दोनों शब्द बोलने एवं सुनने में अवश्य भिन्न प्रतीत होते हैं; परन्तु साधक द्वारा, गुरुपदिष्ट ज्ञान की साधना के माध्यम से, अज्ञानावरण हटा देने पर मुक्त आत्मा का परमात्मा के साथ तादात्म्य(एकता) हो जाता है ॥३९॥
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देह धरैं यह जीव हैं, ईश्वर धरैं बिराट ।
कारज कारन भ्रम गयें, सुन्दर ब्रह्म निराट ॥४०॥
इन दोनों में जीवात्मा यह(प्राणियों का) शरीर धारण करता तथा ईश्वर(परमात्मा) विराट्(विश्व) रूप है । कार्य कारण मात्र से ही हम को यह भेद(द्वैत भ्रम) प्रतीत हो रहा है, यथार्थ में तो वे दोनों एक(विराट) ही है ॥४०॥
(क्रमशः)

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