🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
.
३०. ज्ञानी कौ अंग २९/३२
.
भावै तनु काशी तजौ, भावै बागड मांहिं ।
सुन्दर जीवन मुक्त कै, संसय कोऊ नांहिं ॥२९॥
उस ज्ञानी का देहपात भले ही काशी जैसे पवित्र क्षेत्र में हो, या मरुभूमि(बागड देश) में हो - इस की चिन्ता ज्ञानी को नहीं होती; क्योंकि वह, ब्रह्मज्ञान के कारण, जीवन्मुक्त हो चुका है । जीवन्मुक्त को ऐसे हीन(निकृष्ट) शङ्का - सन्देह नहीं हुआ करते ॥२९॥ (तु० : कासी तजि मगहर गयौ, कबीर भरोसै रांम - श्रीदा०वा० १९/५३)
.
जैसौ कासी क्षेत्र है, तैसौ बागड देस ।
सुन्दर जीवन मुक्त कै, संक नहीं लवलेस ॥३०॥
उस ज्ञानी के लिये काशी जैसा पवित्र देश एवं मरुभूमि जैसा हीनदेश - दोनों समान ही हैं । जीवन्मुक्तावस्था में ज्ञानी को ऐसी शङ्काएँ कभी नहीं उद्भूत होती ॥३०॥
.
अज्ञानी कौ जगत सब, दीसै दुख संताप ।
सुन्दर ज्ञानी कै सकल, ब्रह्म बिराजै आप ॥३१॥
अज्ञानी एवं ज्ञानी में भेद - अज्ञानी को समस्त संसार दुःख, शोक एवं सन्ताप से परिपूर्ण एवं भयजनक लगता है, जब कि ज्ञानी के वे तथाकथित सांसारिक दुःख, शोक एवं सन्ताप भय आदि ब्रह्मज्ञान के नीचे दब जाते हैं ॥३१॥
.
अज्ञानी कौ जगत यह, दुखदाइक भै त्रास ।
सुन्दर ज्ञानी कै जगत, है सब ब्रह्म बिलास ॥३२॥
यही कारण है कि अज्ञानी को वे सांसारिक शोक सन्ताप एवं भय जहाँ दुःखदायक हो जाते हैं; वहीं ज्ञानी इन शोक, सन्ताप आदि को ब्रह्मलीला मान कर मौन रहता है ॥३२॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें