मंगलवार, 21 जुलाई 2026

लालदासजी की शिष्य परंपरा

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
*दादू पूरणहारा पूरसी, जो चित रहसी ठाम ।*
*अन्तर तैं हरि उमग सी, सकल निरंतर राम ॥*
.
लालदासजी की शिष्य परंपरा ~
१~लालदासजी, २~हेमदासजी, ३~तोलारामजी, ४~स्वरूपदासजी, ५~रामरतनजी, ६~समर्थरामजी ७~रामदयालजी, ८~परशरामजी, ९~रामनारायणजी वर्तमान हैं, यह जोधपुर अस्थल की परंपरा है ।
.
२ हेमदासजी = भी अपने गुरु देव लालदासजी के समान भजनानन्दी महात्मा थे । स्थान इनने भी नहीं बनाया था । 
 .
(१६) ३ तोलारामजी = लालदासजी के पौत्र शिष्य तोलारामजी से उनके भक्तों ने प्रार्थना की कि- स्वामिन् ! सन्तों के भजन करने के लिये स्थान अवश्य ही बनना चाहिये । आप हम लोगों को स्थान बनाने की आज्ञा अवश्य दें । स्थान होने से हम लोग भी स्थान पर आकर संतों के दर्शन, सत्संग भजन, कीर्तन का लाभ लेते रहेंगे । अतः भक्तों के आग्रह से स्थान बनाने की स्वीकृति तोलारामजी ने दे दी और स्थान बन गया ।
.
तोलारामजी के एक गुरु भाई ह्रदयरामजी भी अच्छे सन्त थे । हृदयरामजी अत्यन्त दयालु थे । वे पशु पक्षी को भी दुःखी देखते थे तो उसकी सेवा में तन, मन, धन से लग जाते थे और जब तक उसका दुःख न मिटे तब तक सेवा करते रहते थे । तोलारामजी के पास एक छोटी सी तुम्बी थी । वे उसे आवश्यकतानुसार रुपये आदि निकालते रहते थे । लगातार निकालने पर भी वह खाली कभी भी नहीं होती थी । तोलारामजी ने गरीबदासोत महन्तों के १८ चातुर्मास करवाये थे । उस तुम्बी से द्रव्य निकाल २ कर ।
कहा भी है~
"संत सम्पदा अल्प भी, होती परम अपार ।
तूम्बी तोलाराम की, देती थी इकतार ॥३५८॥ दृ. त. ११॥
.
तोलारामजी के अस्थल में एक दिन रात्रि को एक चोर घुस गया और अन्न भंडार से अन्न की पोट बांध ली । लोभवश अधिक अनाज बांध लेने से वह पोट उससे उठती नहीं थी । तोलारामजी भजन कर रहे थे । उन्होंने उसे पोट बांधते देख लिया था किन्तु बोले नहीं थे । जब पोट नहीं उठी तब उसे दुःखी देखकर आये और बोले-"लो उठाओ मैं उठवाता हूँ ।"
.
संत को पास आया देख कर चोर डरा किन्तु संतजी ने कहा~ डरो मत तुम्हारे यहां इसकी आवश्यकता है, और यहां कोई कमी नहीं है । तुम ले जाओ । अधिक बोलने से दूसरे लोग जग जायेंगे । उसे पोट उंचाकर झट भेज दिया । कहा भी है~
"श्रेष्ठ संत सब से रखें, सहानुभूति दे क्षेम ।
पोट ऊंचाई चोर को, तोलाराम सप्रेम ॥११७॥दृ. त. १३ ।१७
.
राजारामजी = तोलारामजी के मुख्य शिष्य राजारामजी जाति से वैश्य थे और नेत्रहीन थे । इससे बचपन में ही इनको तोलारामजी का शिष्य होने का सौभाग्य मिल गया था । इनके माता पिता ने इनको महात्मा तोलारामजी की भेंट कर दिया था । तोलारामजी ने इनको संपूर्ण दादूवाणी कंठस्थ करवादी थी तथा नियम दिला दिया था कि~प्रति दिन संपूर्ण दादूवाणी का पाठ कर के ही भोजन करना । अतः ये गुरुजी की आज्ञानुसार संपूर्ण दादूवाणी का पाठ कर के ही भोजन करते थे ।
.
राजारामजी प्रतिदिन रात के दो बजे उठ कर पाठ आरंभ करते थे और आठ बजे वाणी का पाठ पूरा कर देते थे । यह नियम इनका जीवन पर्यन्त सुचारू रूप से चलता रहा था । वाणी पाठ के प्रताप से इनको वचन सिद्धि प्राप्त हो गई थी अर्थात् इनका वचन सत्य ही होता था । कहा भी है~
संत गिरा के पाठ से सिद्धावस्था होय ।
बोले राजारामजी, मिथ्या होत न कोय ॥११६ दृ. त. १३
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें