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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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३०. ज्ञानी कौ अंग ४५/४८
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बन तैं घर आवै नहीं, घर तैं बन नहिं जाइ ।
सुन्दर रवि उद्दोत तैं, तिमिर कहां ठहराइ ॥४५॥
एक बात और, ब्रह्मज्ञान होने पर यदि ज्ञानी वन में रह रहा हो घर में आना(गृहस्थ होना) उसके लिये आवश्यक नहीं और यदि ज्ञानावस्था में वह घर में है तो उसे वन में जाने(संन्यासी होने) की आवश्यकता ही नहीं हैं; क्योंकि सभी जानते हैं कि सूर्य के प्रकाश के सम्मुख अन्धकार कहीं भी नहीं ठहर पाता ! ॥४५॥
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पंखी की पर टूट कैं, भूमि पर्यौ जिहिं ठौर ।
सुन्दर उडिबे तें रह्यौ, मिटी सकल ही दौर ॥४६॥
सचाई यह भी है - जैसे किसी पक्षी के पंख टूट जाने पर वह जहाँ गिरता है, वहाँ पड़ा रह जाता है वहाँ से उड़ नहीं पाता । यही स्थिति ज्ञानी की भी होती है । उस की स्थिति पक्षविहीन पक्षी के तुल्य हो जाती है । उस की भी जब समस्त जन्मपरम्परा नष्ट हो जाती है, तब वह अवशिष्ट प्रारब्ध कर्म भोग कर निर्वाण(मुक्ति) प्राप्त कर लेता है ॥४६॥
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एक क्रिया खेती करै, बंधन होत अपार ।
एक क्रिया भोजन करत, बंधन उतनी बार ॥४७॥
मनुष्यों का एक कर्म(क्रिया) कृषि(खेतन में अन्न पैदा करना) है । जिस में 'यह करो, यह न करो' आदि अनेक विधि - निषेध रूप बन्धन लगे होते हैं । इसी प्रकार, मनुष्यों का एक कर्म भोजन भी है; उसमें भी समाज ने उतने ही प्रकार के विधि - निषेधात्मक बन्धन लगा रखे हैं ॥४७॥
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एक क्रिया मल मूत्र कौं, तजत नहीं कछु प्यार ।
सुन्दर ज्ञानी की क्रिया, बंधन नहीं लगार ॥४८॥
मनुष्यों के साथ एक नित्य(दैनिक) क्रिया बन्धन के रूप में मल मूत्र के त्याग की भी लगी हुई है जिसको वे किसी राग के विना ही प्रतिदिन करते हैं । श्रीसुन्दरदासजी के कहने का तात्पर्य यह है कि संसार की छोटी बड़ी सभी क्रियाएँ बन्धन रूप हैं । केवल ज्ञानी की ज्ञानक्रिया ही एक ऐसी क्रिया है जिसमें किसी प्रकार का बन्धन नहीं है ॥४८॥
(क्रमशः)

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