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🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
*आत्मदेव आराधिये, विरोधिये नहीं कोइ ।*
*आराधे सुख ऊपजै, विरोधे दुख होइ ॥१२॥*
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अथ अध्याय २ =
२१. तोलारामजी = दांतारामगढ़ के पास वाय ग्राम में तोलारामजी का साधन धाम था । ये भजनानन्दी महात्मा थे । इनके गुरु महाराज ने एक कूप बनवाया था किन्तु उसमें पानी बहुत कम आया । तब एक दूसरा कूप बनवाया उसमें भी जल पर्याप्त नहीं निकला तब तोलारामजी के गुरुजी को बहुत चिन्ता हुई कि दूसरा कूप बनवाने पर इसमें भी यथेष्ट जल नहीं मिल सका अब क्या किया जाय ?
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तब तोलारामजी अपने गुरुजी का चिन्ता जन्य दुख देखकर अपना कमंडलु लेकर उन कूपों पर गये और दोनों कुओं में अपने कमंडलु का पानी थोड़ा २ डाल आये । पानी डालते ही उन दोनों कुओं में यथेष्ट जल आ गया था । फिर उक्त चमत्कार से जनता उनके पास बहुत आने लगी तब उन्होंने अपने भजन में विघ्न मानकर वाय ग्राम छोड़ दिया था और भैराणे में आकर भजन करने लगे थे । भैराणे में ही इनका देहान्त होने पर ब्रह्मलीन हुये थे ।
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ये अच्छे संत थे कहा भी है~
संतन की लव वस्तु भी, बढ़ती सहज सुजान ।
तोलाराम जल कूप में, देखत बढ़ा महान ॥२०३॥दृ.त. ११
संत प्रतिष्ठा स्थान को, त्याग अन्य थल जाय ॥
तोलाराम तज कर रहे, भैराणे में आय ॥२०५॥दृ.त. ११
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२२. हरिभक्तजी =
हरिभक्तजी पचार स्थान के अतीत थे अर्थात् स्थान के महन्त नहीं थे, स्थान में दीक्षित थे । हरिभक्तजी सामान्यतः सभी शास्रों के ज्ञाता थे । इनको पौराणिक ज्ञान विशेष था । श्रीमद्भागवत् की कथा आप उत्तम करते थे । गरीबदासोतों के महन्त सूरतरामजी ने हरिभक्तजी से अध्ययन किया था । हरिभक्तजी को छन्द शास्त्र का ज्ञान विशेष रूप से था । कन्हीरामजी बुवाणी वालो ने छंद शास्त्र का ज्ञान हरिभक्तजी से ही प्राप्त किया था । हरिभक्तजी अच्छे विद्वान् संत थे । वि.सं. १९१५ में ब्रह्मलीन हुये थे ।
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२३. चरणदासजी = चरणदासजी नारायणा दादूधाम के गरीबदासजी के थांभे में दीक्षित थे । ये संगीत में अच्छे प्रवीण थे । विशेषतः साम्प्रदायिक भजनों की लय के आप विशिष्ट ज्ञाता थे । खालसे के गाने वालों ने आपसे ही यह गुण प्राप्त किया था । भगवानदासजी, सूरतरामजी, रामनारायणजी इन तीन गरीबदासोत महन्तों के आगे चरणदासजी ने गायन का कार्य किया था । वि.सं. १९२० में आप ब्रह्मलीन हुये थे । इनके चरण गरीबदासोत महन्तों के बराबर भैराणे में पधराये हुये हैं । इससे प्रतीत होता है कि इनका समाज में बहुत समादर था । ये अच्छे गायक संत थे ।
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२४. रामरतनजी = रामरतनजी गरीबदासोतों के किशनगढ़ के स्थान में दीक्षित हुये थे । आपने भी संगीत का अच्छा अभ्यास किया था । ये सितार बहुत अच्छा बजाते थे । चरणदासजी के पश्चात् आपने भी तीन गरीबदासोत महन्तों के काल में गायन कार्य किया था । वे महन्त~ १-रामनारायणजी, २- गोविन्ददासजी, ३- बोलतारामजी थे । आप वि.सं. १९४८ के आसपास ब्रह्मलीन हुये थे ।
(क्रमशः)
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