शुक्रवार, 17 जुलाई 2026

सुखासक्ति का त्याग

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*सुख मांहि दुख बहुत हैं, दुख मांही सुख होइ ।*
*दादू देख विचार कर, आदि अंत फल दोइ ॥*
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*॥ श्रीहरि: ॥*
दिनांक 17.7.26.
वि. सं. 2083, 'रौद्र' नाम संवत्सर, आषाढ़ मास, शुक्ल पक्ष, तृतीया, शुक्रवार। (गीता दैनन्दिनी अनुसार)।
1- परम श्रद्धेय स्वामीजी श्री रामसुखदासजी महाराजका प्रवचन—
दिनांक— 13.9.95, सांय 5.0 बजे।
स्थान— गांधी मैदान, जोधपुर।
*विषय— सुखासक्ति का त्याग।*
2- गीता पाठ— गीता पाठ अध्याय 17 श्लोक संख्या 21 से 28 तक।
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*🕉️ संसारमें जो सुख सामग्री दिख रही है, यह सब धोखा है और परमात्मा सबको आनन्द देने वाले हैं। धोखे वाली चीज आपका निरन्तर त्याग कर रही है और परमात्माका और आपका संबंध नित्य-निरन्तर है, परमात्मा कभी किसीका साथ छोड़ते ही नहीं। जो आपसे नित्य निरन्तर अलग हो रहा है, उस शरीर-संसारसे अलग होना है और जो परमात्मा नित्य निरन्तर आपके साथ रह रहे हैं, उन्हीं परमात्माको प्राप्त करना है। यह सत्संगकी खास बात है।*
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*🕉️ रुपये आ जाय, अनुकूल पदार्थ मिल जाय, मैं सुख पूर्वक जीता रहूँ— ये खास मोह है, आदर, मान, सत्कार अच्छा लगता है, ऐसी रूचि पतन करने वाली है। संसारको, नाशवान् वस्तुओंको सत्ता-महत्ता दे दी है, यह बाधा है। ये सब वस्तुएँ तो रहेगी नहीं और इनकी आशा, विश्वास, भरोसा रखा तो दुःख पाना पड़ेगा, रोना पड़ेगा। मनुष्य मरनेसे डरते हैं, वह मृत्यु प्रतिक्षण नजदीक आ रही है। आप यदि अपना कल्याण चाहते हैं, तो भोगोंका और अनुकूलताकी इच्छाका विषके समान त्याग कर देना चाहिए। भोग पदार्थ, आराम, मान-बड़ाई अच्छे लगते हैं, यह खास खतरा है।*
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*🕉️अनुकूलता जितना बांधती है, प्रतिकूलता उतना नहीं बांधती। अनुकूलताका सुख बेहोश कर देने वाला है, लेकिन प्रतिकूलता होशमें लाने वाली है। सावधान रहने वाला अनुकूलता-प्रतिकूलता, दोनोंमें नहीं फँसता है। भोग पदार्थ, मान-बढ़ाई, आदर-सत्कार, आराम— ये बांधने वाले हैं; अपमान, निन्दा, तिरस्कार, पैसोंका घाटा आदि बुरे लगते हैं, लेकिन ये दुखदाई परिस्थितियाँ आपको कल्याणकी तरफ अग्रसर कराने वाली हैं। खेड़ापाके श्रीरामदास जी महाराजको जोधपुरके राजाने देश-निकाला दे दिया, हुक्म मिला जब वे मकानके बाहर दातुन कर रहे थे, उसी समय वहाँसे चल दिए, गुरु महाराजका दिया हुआ गुटका और छड़ी साथमें ली, उसीमें आनन्द मान लिया, मकान, रुपये-पैसों आदिकी तरफ देखा ही नहीं।*
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*🕉️श्रीमद्भागवतमें भगवान् कहते हैं— 'जिस पर मैं कृपा करता हूँ, उसका धन हर लेता हूँ, भाई-बंधुओंसे संबंध विच्छेद करा देता हूँ, सब तरफसे उसके ऊपर दुःख आ जाते हैं— फिर भी वह मेरा भजन नहीं छोड़ता है, तो मैं उस भक्तका दास हो जाता हूँ।' जैसे वैद्य कड़वी दवाई रोगीका रोग दूर करनेके लिए देता है, ऐसे ही भगवान् प्रतिकूलता हमें जन्म-मरणसे रहित करनेके लिए, अपना प्रेम प्रदान करनेके लिए देते हैं, इसलिए प्रतिकूलतामें दु:खी नहीं होकर परम आनन्द मनाना चाहिए।*
बहुत श्रेष्ठ प्रवचन है।

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