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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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३०. ज्ञानी कौ अंग १३/१६
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बंध मोक्ष जाकै नहीं, स्वर्ग नरक नहिं दोइ ।
सुन्दर ज्ञानी ज्ञानमय, संशय रह्यौ न कोइ ॥१३॥
महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - ऐसी उच्चतम अवस्था वाले ज्ञानी के लिये संसार में न कहीं कोई बन्धन है, न मोक्ष । न कोई स्वर्ग तक पहुँचाने वाला पुण्य कर्म रह जाता है और न कोई नरक में गिराने वाला पापकर्म । वह(ज्ञानी) उस स्थिति में पहुँच कर निरन्तर ज्ञानमय अवस्था में ही लीन रहता है ॥१३॥
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घर बन दोऊ सारिखे, नां कछु ग्रहण न त्याग ।
सुन्दर ज्ञानी ज्ञानमय, नां कहुं राग बिराग ॥१४॥
इस स्थिति में पहुँच कर उस ज्ञानी का न घर(गृहस्थ धर्म) के प्रति राग(आसक्ति) रह जाता है, न वन(संन्यास) के प्रति मोह । वह इन दोनों(घर एवं वन) को न ग्रहण(स्वीकार) करता है न छोड़ता है; क्योंकि उसकी दृष्टि में न कहीं राग का महत्त्व रह गया है न वैराग्य का । अतः वह अब निरन्तर ज्ञानमय स्थिति में ही स्थित रहता है१ ॥१४॥
(१ तु० श्रीदादूवाणी :
दादू जिन प्रांणी करि जाणियां, घर बन एक समान ।
घर मांहै बन ज्यौं रहै, सोई साध सुजान ॥१६/२९)
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निंदा स्तुती देह की, कर्म शुभाशुभ देह ।
सुन्दर ज्ञानी ज्ञानमय, कछू न जानै येह ॥१५॥
उस की दृष्टि में सांसारिक निन्दा एवं स्तुति तथा ये लौकिक शुभ या अशुभ कर्म देह से होते हैं, अतः वही इन के प्रति उत्तरदायी है । अतः, ज्ञानी इन सब की उपेक्षा करता हुआ निरन्तर ब्राह्मी स्थिति में ही स्थित रहता है ॥१५॥
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काहू सौं घटि बढि नहीं, काहू निकट न दूरि ।
सुन्दर ज्ञानी ज्ञानमय, ब्रह्म रह्या भरपूरि ॥१६॥
वह ज्ञानी न वह किसी से अल्प प्रेम ही करता है और न अधिक द्वेष ही(घटि बढि) । न वह किसी से घनिष्ठ सम्बन्ध बनाता है और न बहुत दूर तक किसी से द्वेष ही रखता है । वह तो एकमात्र निरञ्जन निराकार प्रभु को सर्वव्यापक मानता हुआ सर्वदा उसी में लीन रहता है ॥१६॥
(क्रमशः)

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