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🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
*दादू एता अविगत आप थैं, साधों का अधिकार ।*
*चौरासी लख जीव का, तन मन फेरि सँवार ॥*
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प्रेमदासजी = प्रेमदासजी महाराज आचार्य गरीबदासजी महाराज के शिष्य थे तथा केवलरामजी के गुरुभाई थे । आप विरक्त तथा सिद्ध संत थे । एक समय भ्रमण करते हुये खोरबसई ग्राम जो माँदी से १०-१२ मील पर है, उसके बाहर एक बड़ वृक्ष के नीचे आकर विराजे । यह बड़ सुन्दर तथा महान् भी था । इसमें एक जिंद रहता था । कोई अनजान यात्री रात्रि को उसके नीचे रह जाता था तो उसे वह जिंद मार देता था । यह ग्राम अलवर राज्य में था ।
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मानव मरने की घटना सुनकर राजकीय अधिकारी आते थे, ग्राम वालो तंग करते और कहते थे, धन के लालच से तुम मारते हो और जिन्द का नाम ले देते हो । अंत में सरकार ने ने उस बड़ के नीचे रात्रि का रहना निषेध कर दिया । प्रेमदासजी को उस बड़ के नीचे बैठे देखकर ग्राम के लोगों ने तथा राजपुरुषों ने कहा~ रात्रि को यहां किसी को भी नहीं रहने दिया जाता है । अतः आप ग्राम में पधारें । ग्राम में आप की सेवा की सब व्यवस्था हो जायेगी । इस बड़ में जिन्द रहता है, यहां रहने वाले को मार देता है ।
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यह कहने पर भी प्रेमदासजी ने कहा~ हम यहां ही रहेंगे ।
जिनको इस शरीर की सेवा करनी हो वे यहां कर दें । प्रेमदासजी का दृढ निश्चय देखकर सब लोग ग्राम को लौट गये । प्रेमदासजी भगवद् भजन करने लगे । फिर अर्धरात्रि की जिन्द ने अपनी चेष्टा आरंभ की । जहां महात्मा प्रेमदासजी सिद्धासन लगाये हुये भजन कर रहे थे, ठीक उसके ऊपर की शाखा पर बैठकर अपने पैर नीचे लटकाने लगा ।
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प्रेमदासजी के सामने उसके पैर आये तब उन्होंने जान लिया कि ये जिन्द के पैर हैं । फिर प्रेमदासजी ने श्रीदादू वाणी का पाठ उच्चस्वर से आरंभ कर दिया ।वाणी का पाठ सुनने से प्रेमदासजी के विपरीत चेष्टा करना तो तो उसका रुक गया । वह उनके समीप भी नहीं जा सका । दूर खड़े रहने पर भी प्रेमदासजी के तपतेज से वह जलने लगा और उच्चस्वर से कहने लगा मेरी रक्षा करो रक्षा करो । उसकी उक्त आवाज ग्राम वालों को भी सुनाई देने लगी ।
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प्रेमदासजी ने उसके दुःख पूर्ण शब्द सुनकर दादूवाणी का पाठ समाप्त किया और उसे पूछा क्यों भाई क्या बात है ? उसने कहा~“मेरा शरीर जल रहा है, आप मुझ पर कृपा करें ।” उसका उक्त वचन सुनकर प्रेमदासजी बोले~ यह जलन तो तेरे कर्मों का ही फल है । तूने इस वृक्ष के नीचे कई मानवों की हिंसा की है । उसका फल तुझे भोगना ही होगा । अब तुम तब ही इस दुःख से बच सकते हो जब इस वृक्ष को त्यागकर अन्यत्र चले जाओंगे और यदि फिर यहां आओ तो यही दुःख तुम्हें फिर भोगना पड़ेगा ।
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वह जिन्द फिर प्रेमदासजी की आज्ञानुसार उस बड़ से सदा के लिये चला गया । जिन्द को वहां से भगा देने से वहां की जनता तथा राजपुरुषों की प्रेमदासजी पर भारी श्रद्धा हो गई । फिर प्रेमदासदासजी ने कुछ दिन वहां ठहरकर जनता को दर्शन तथा सत्संग से सुख प्रदान किया । फिर अन्यत्र विचर गये ।
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खोरबसई के आसपास के ग्रामों में भ्रमण करते हुये प्रेमदासजी को एक हरिसिंह राजपूत वन में भेड़ बकरी चराता हुआ मिला । वह संतों में श्रद्धा रखता था, यथाशक्ति संतों की सेवा भी करता था । प्रेमदासजी की भी उसने यथाशक्ति सेवा की और उनका कल्याणमय उपदेश भी सुना । हरिसिंह की श्रद्धा भक्ति देखकर तथा उसे अधिकारी जानकार प्रेमदासजी ने उसे कहा~हरिया भेड़ बकरियों का मोह छोड़कर हरि का भजन कर और संसार का कल्याण कर ।
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उक्त वचन ने हरिसिंह को हरिदास बना दिया । हरिदास अब गुरु प्रेमदासजी की सेवा में रहकर उनके उपदेशानुसार साधन करके सिद्धावस्था को प्राप्त हो गया । निरंतर हरि भजन में लीन रहने लगा । आसपास के ग्रामों में प्रेमदासजी महाराज की कीर्ति फ़ैल गई थी कि प्रेमदासजी सिद्धकोटि के संत हैं ।
(क्रमशः)

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