मंगलवार, 28 जुलाई 2026

३०. ज्ञानी कौ अंग ५७/६०

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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३०. ज्ञानी कौ अंग ५७/६० 
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सुन्दर सब कौं ज्ञान की, बातैं कहै अनेक । 
ज्यौं दर्पन बहु भांति कै, अग्नि परै कहुं एक ॥५७॥
ज्ञान के अभिन्न होने पर भी उसके वर्णन में भिन्नता : जैसे बहुत से दर्पणों से, भिन्न भिन्न होने पर भी उस में पड़ते हुए सूर्य के प्रतिबिम्ब से एक ही प्रकार की अग्नि उद्भूत होती है; उसी प्रकार सच्चे अभेदज्ञानोपदेश से भिन्न भिन्न प्रकार का वर्णन होने पर भी ज्ञान सब को एक समान(अभेद ज्ञान) ही होगा ॥५७॥
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देह चलै आतम अचल, चलत कहैं मतिमंद । 
अभ्र चलत ज्यौं देखिये, सुन्दर चलै न चन्द ॥५८॥
कुछ दृष्टान्तों द्वारा भ्रमज्ञान का निवारण : वस्तुतः आत्मा अचल(अविनाशी) एवं यह शरीर चल(विनाशी) है; परन्तु मूर्ख(अविवेकी) पुरुष इस आत्मा को उसी प्रकार चल मान बैठते हैं, जैसे कोई बालक आकाश में मेघों को उड़ता हुआ देख कर चन्द्रमा को चल मान लेता है, जब कि सचाई इसके सर्वथा विपरीत होती है ॥५८॥ (१)
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सूरय करि कैं देखिये, तवा आरसी दोइ । 
सूरय सूरय सौं दृसै, सुन्दर संमुझै कोइ ॥५९॥
भले ही कोई सूर्य के सम्मुख तवा करे या दर्पण, उस में सूर्य सूर्य रूप में दीखेगा । इसी प्रकार, आत्मा का सब भूतों या प्राणियों में पड़ने वाला प्रतिबिम्ब एक समान ही होता है ॥५९॥ (२)
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जो भिक्षा मांगत फिरै, कै जो भुक्ते राज । 
सुन्दर ज्ञानी मुक्त है, नां कछु काज अकाज ॥६०॥
ज्ञानप्राप्ति के बाद, ज्ञानी का कोई कर्तव्य या अकर्तव्य नहीं रह जाता । परन्तु पूर्व प्रारब्धवश सञ्चित्त कर्मों को, उनमें अलिप्त रहता हुआ वह राजा या रङ्ग के रूप में राज्य भोगता हुए या भिक्षा मांगते हुए भोगता रहता है ॥६०॥
(क्रमशः) 

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