*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२०. सुमिरण का अंग ~६५/६८*
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रज्जब नाम नराधिपति, सकल अंग उमराव ।
मिलेहि कारज सिद्ध ह्वै, अमिल मडै१ नहिं पाव ॥६५॥
ईश्वर नाम राजा के समान है, अन्य साधन सरदारों के समान है राजा और सरदार मिलकर कार्य करे तो सुगमता से सिद्ध होता है, नहीं मिलने से सरदारों के पैर कार्य सिद्धि तक नहीं टिक१ सकते, वैसे ही नाम और अन्य साधन मिलकर तो मुक्ति रूप कार्य कर लेते हैं, नाम बिना अन्य साधन मुक्ति रूप कार्य सिद्ध करने में समर्थ नहीं होते ।
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अज्ञान कष्ट अठसठ सहित, सब व्रत रोजे कीन ।
जन रज्जब हरि नाम में, मन वच कर्म जो लीन ॥६६॥
अज्ञानावस्था में अड़सठ तीर्थों के स्नान, सब प्रकार के व्रत, रोजे करे जाते हैं, उन सब का फल उसे प्राप्त हो जाता है, जो मन, वचन और कर्मों से हरि-नाम-सुमिरण में लगा रहता है ।
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सुमिरण करे सु शास्त्र है, बुधि उपजे सो वेद ।
विषया तजे सु व्याकरण, रज्जब पाया भेद ॥६७॥
हरि-नाम-सुमिरण करना ही श्रेष्ठ शास्त्रों का अभ्यास करना है, बुद्धि ब्रह्म ज्ञान उत्पन्न होना ही वेदाध्यायन है, विषयों का त्याग करना ही व्याकरण पढ़ना है । इस प्रकार गुरु कृपा से हमने वेदादी का यथार्थ रहस्य प्राप्त किया है ।
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अस्थूल सु अक्षर अर्थ हरि, काढे पंडित प्राण ।
रज्जब ज्ञाता गुणी सो, समझ्या सोइ सुजाण ॥६८॥
मंत्र के अक्षर तो स्थूल है, उनमें जो अर्थ है, वही हरि है, जो प्राणी पंडित होता है, वही शब्दार्थ रूप हरि को निकाल कर हृदय में धारण करता है, तब वही ज्ञानी, गुणी, समझदार और सुजान कहलाता है ।
(क्रमशः)

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