बुधवार, 1 जुलाई 2026

२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग १/४

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
.
२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग १/४
.
सुन्दर हौं नहिं और कछु, तूं कछु और न होइ ।
जगत कहा कछु और है, एक अखंडित सोइ ॥१॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - हे जिज्ञासु ! मैं कोई दूसरा नहीं हूँ, न तूं ही कोई दूसरा है, न यह संसार ही कोई दूसरा हैं; क्योंकि मुझ में, तुझ में और इस समस्त संसार में एक अखण्ड, सर्वव्यापक वह परमात्मा ही एकान्ततः विद्यमान है ॥१॥
.
सुन्दर हौं नहिं तूं नहीं, जगत नहीं ब्रह्मंड ।
हौं पुनि तूं पुनि जगत पुनि, ब्यापक ब्रह्म अखंड ॥२॥
वस्तुतः मैं, तूं या यह समस्त ब्रह्माण्डमय संसार - इनमें कोई भी दूसरा नहीं है; क्योंकि हम सब में एकमात्र वह सर्वव्यापक ब्रह्म ही सर्वत्र व्याप्त है ॥२॥ (द्र० - सवैया : ३२/२ छ०).
.
सुन्दर पहली ब्रह्म था, अबहूं ब्रह्म अखंड ।
आगै हूं यह ब्रह्म है, मृषा पिण्ड ब्रह्मंड ॥३॥
भूतकाल में भी हम सब में वह अखण्ड और व्यापक ब्रह्म ही वर्तमान था, और आज भी वही वर्तमान है तथा भविष्य में भी हम सब में उसी की सत्ता रहेगी । इस समस्त ब्रह्माण्ड एवं तेरे और मेरे शरीर में भासने वाला द्वैत ज्ञान तो सर्वथा मिथ्या(भ्रम) ही है ॥३॥
.
बृक्षन कौं बन कहत हैं, बन मैं बृक्ष अनेक ।
सुन्दर द्वैत कछू नहीं, बृक्ष रु बन तौ एक ॥४॥
उदाहरणों द्वारा अद्वैत सिद्धि : यद्यपि लोकव्यवहार में हम वृक्षों(के समूह) को 'वन' कहते हैं; परन्तु वहाँ अनेक वृक्ष दिखायी देते हैं; तथापि वहाँ भी वस्तुतः कोई द्वैत नहीं है; 'वृक्ष' और 'वन' तो एक ही वस्तु की दो संज्ञा(नाम) हैं ॥४॥ (द्र० सवैया : ३२/४ छ०)
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें