सोमवार, 13 जुलाई 2026

२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग ४८/५०

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग ४८/५०
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सुन्दर अष्टावक्र ऋषि, ब्रह्म बतायौ एक । 
दूरि कियौ भ्रम सकल ही, जो नानात्व अनेक ॥४८॥
इसी प्रकार, अष्टावक्र ऋषि ने भी अपनी अष्टावक्र गीता में ब्रह्मज्ञान का ही एकान्ततः उपदेश किया है । उस में जगत् के विभेद(नानात्व) का सर्वथा खण्डन ही किया है ॥४८॥
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दत्तात्रय मुनि यौं कह्यौ, ब्रह्म बिना कछु नांहिं । 
सुन्दर सोई कृष्णजी, भाख्यौ गीता मांहिं ॥४९॥
दत्तात्रेय मुनि ने अपने दत्तात्रेयसंहिता ग्रन्थ में यही कहा है कि यह सम्पूर्ण दृश्यमान जगत् सर्वथा ब्रह्ममय है । इसी प्रकार श्रीमद्भगवद्‌गीता में भी श्रीकृष्ण ने प्राधान्यतः ब्रह्मज्ञान का ही सदुपदेश किया है ॥४९॥
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सुन्दर यहै निरूपियौ, बहु विधि करि वेदांत । 
ब्रह्म बिना दूजा नहीं, सबकौ यह सिद्धांत ॥५०॥ 
इति अद्वैतज्ञान कौ अंग ॥२९॥
अधिक क्या कहें ! उपनिषद्, ब्रह्मसूत्र एवं शाङ्करभाष्य आदि वेदान्त के ग्रन्थों में विविध रीतियों से 'ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या' का ही प्रधानतः निरूपण है । अतः उपर्युक्त प्रमाणों से यही सिद्ध हुआ कि इस जगत् में ब्रह्म के अतिरिक्त कुछ भी सत्य नहीं है ॥५०॥
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इति अद्वैतज्ञान का अंग सम्पन्न ॥२९॥
(क्रमशः)

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