गुरुवार, 9 जुलाई 2026

२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग ३३/३६

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग ३३/३६
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सुन्दर ज्यौं आकाश मैं, अभ्र होइ मिटि जांहिं । 
त्यौं आतम तैं जगत है; ता ही मध्य समांहि ॥३३॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - जैसे आकाश में बादल आते हैं और चले जाते हैं, वैसे ही यह संसार भी आत्मा में समा जाता है ॥३३॥
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जहं सुन्दर तहं जग नहीं, जग तहं सुन्दर नित्य । 
जहं पृथ्वी तहं घट नहीं, घट तहं पृथ्वी सत्य ॥३४॥
जहाँ संसार की सत्ता हो वहाँ ब्रह्म नित्यरूप से रहता है; परन्तु यह आवश्यक नहीं कि जहाँ ब्रह्म की सत्ता हो वहाँ संसार की सत्ता भी रहे ही ॥३४॥
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वोहं सोहं एक ही, तूं ही हूं ही एक । 
कहिबे ही कौ फेर है, सुन्दर संमुझि बिबेक ॥३५॥
वह(ब्रह्म) और मैं एक ही हैं । इसी प्रकार तूं(जिज्ञासु) और मैं(सद्‌गुरु) भी एक ही हैं । केवल कथनव्यवहार में भिन्नता दिखायी दे सकती है; परन्तु विवेकपूर्वक चिन्तन करने पर वे एक ही ज्ञात होंगे ॥३५॥
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ज्यौं माता हाऊ कहै, बालक मांनै त्रास । 
त्यौं सुन्दर संसार है, मिथ्या बचन बिलास ॥३६॥
जैसे कोई माता अपने शिशु को भय दिखाने के लिये उस के सामने 'हाउ' ऐसा भयदायक शब्द बोले तो उसे सुन कर वह बालक, भय के कारण काँपने लगता है; वैसे इस संसार का समस्त वाग्विलास(वाणीविस्तार) मिथ्या(भ्रमोत्पादक) ही समझना चाहिये ॥३६॥
(क्रमशः)

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