रविवार, 26 जुलाई 2026

३१ ईश्वरदासजी

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
*दादू सिरजनहारा सबन का, ऐसा है समरत्थ ।*
*सोई सेवक ह्वै रह्या, जहँ सकल पसारैं हत्थ ॥*
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३१ ईश्वरदासजी = ईश्वरदासजी १२ वर्ष स्थान में रहे । सवाईसिंह मारोठ के ठाकुर के पुत्र नहीं था । उसने ईश्वरदासजी से प्रार्थना की । ईश्वरदासजी ने उसको पुत्र होने का वर दिया । पुत्र हो गया । पुत्र होने पर सवाईसिंह ईश्वरदासजी के पूर्ण भक्त हो गये थे और ईश्वरदासजी की तन मन वचनादि से सेवा करते थे । ईश्वरदासजी जंगली औषधियाँ भी जानते थे ।
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शौच जाते थे तब पास के काला पर्वत पर से कुछ बूटियाँ लाया करते थे । अपने पास आने वाले रोगियों को स्वरोदय का विचार करके उचित समझते तो देते थे । सर्प तथा गोहरे का विष भी बूटियों से उतार देते थे । औषधि जिनको देते थे वे निश्चय रूप से ठीक ही हो जाते थे । स्वरोदय के विचार से उचित ज्ञात नहीं होता उसे औषधि नहीं देते थे । फिर वह मर ही जाता था ।
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मारोठ की जनता ईश्वरदासजी को बहुत मानती थी । ईश्वरदासजी भूत व भविष्य को भी जान जाते थे । एक दिन कुचामन के ठाकुर केशरीसिंह आपके दर्शन करने आये थे । उन्होंने पूछा~ मैं पूर्व जन्म में कौन था ? ईश्वरदासजी ने कहा काशी के भंगी । ठाकुर - भंगी से कुचामन नरेश कैसे बना ? ईश्वरदासजी - प्रयाग कुंभ से बहुत से संत काशी गये थे, कुछ के हैजा हो गया था उनकी सेवा के पुण्य से । ठाकुर - इसमें विश्वास कैसे हो ? ईश्वरदास- अब तुम्हारे देह में अदीठ होगा, वह हो जाय तो सत्य मानना । फिर अदीठ होया । इससे ज्ञात होता है, वे भूत भविष्य के ज्ञाता योगी थे ।
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ब्रह्मलीन होना व समाधि = ईश्वरदासजी वि. सं.१९५६ में ब्रह्मलीन हुये हैं, ऐसा उनकी छत्री के शिलालेख से ज्ञात होता है । ईश्वरदासजी की समाधि एक अच्छी छत्री के रूप में एक पर्वत की टेकड़ी पर है । चरण चौकी पर यह शिलालेख अंकित है- वि. सं. १९५६ मार्गशीर्ष कृष्णा ३ सोमवार । हो सकता है यही उनके ब्रह्मलीन होने का समय हो अथवा चरण प्रतिष्ठा का भी हो सकता है । चरण प्रतिष्ठा का हो तो भी कुछ दिनों का ही फरक हो ससकता है । क्योंकि वे वहां अति प्रतिष्ठित थे, अतः उनकी छत्री शीघ्र ही बन गई होगी ।
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चौकी में एक छप्पय भी है, वह भी देखिये~
नगर रम्य मारोठ, बन्या अतिशय कर पावन ।
तहं पंडित ईश्वरदास, भये सज्जन मन भावन ॥
योग स्वरोदय ज्ञान भानु, सोइ तिमिर नशावन ।
प्रकट देत उपदेश, सकल जन दुःख मिटावन ॥
मुख एक कीरति बहुत, कहं लग वर्ण नित नवी ।
आतम निश्चय धार के, ब्रह्मलोक गे तज भुवि ॥१॥
दोहा~ईश्वरदास ईश्वर मिले, काट जगत का मोह ।
विद नाद मन सदन में, मोक्ष पदारथ जोह ॥२॥
ईश्वरदासजी की समाधि की छत्री पर आने वाले भावुकों की कामनायें अब भी पूर्ण होती हैं । भाव से चरण जल पान करने से रोग मिटते हैं । आप मारोठ के प्रतिष्ठित संत माने जाते हैं ।
(क्रमशः)

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