*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२२. अजपा जाप का अंग ~१७/२०*
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*रज्जब जप जप जन थके, अजपा जपा न जाय ।*
*अगह अंभ ज्यों आरसी, आख्यूं सो न गहाय ॥१७॥*
जैसे न ग्रहण करने योग्य दर्पण का पानी आँखों से दिखता तो है किन्तु पकड़ा नहीं जाता, वैसे ही बहुत से भक्त जन जप करते २ थक तो गये है किन्तु उनसे अजपा नहीं जपा जाता अर्थात वह तो स्वत: ही होता रहता है ।
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*स्वपने मन सुमिरन करे, लगे नहीं तन ताप ।*
*अचेत उदर अरभक१ वधै, यूं ह्वै अजपा जाप ॥१८॥*
स्वप्न में मन शरीर में अग्नि लगने का स्मरण करता है तब स्थूल शरीर को कहां ताप लगता है तथा माता के पेट में बालक१ बढ़ता है तब माता को कब पता लगता है कि किस क्षण में कितना बढ़ा, ऐसे ही अनजान में निरंतर अजपा जाप होता रहता है ।
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*मन पवन अरु सुरति को, आतम पकङै आप ।*
*रज्जब लावै तत्त्व सौं, यूं ही अजपा जाम ॥१९॥*
जब साधक आत्मा मन और बुद्धि वृत्ति को स्वयं निग्रह करके परब्रह्म रूप तत्त्व के चिन्तन में लगता है तब जैसे चिन्तन निरंतर होता रहता है, वैसे ही अजपा जाप होता है ।
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*ब्रह्माण्ड पिण्ड मन प्राण तज, सुख में सुरति समाय ।*
*रज्जब अजपा जाप यहु, नर देखो निरताय ॥२०॥*
ब्रह्माण्ड, शरीर, मन, प्राण इन सबको त्याग कर बुद्धि - वृत्ति सुख स्वरूप ब्रह्म में समा जाय, इसका नाम अजपा जाप है । हे साधक नरो ! विचार करके देखो, तुम्हें भी भली भांति ज्ञात होगा ।
(क्रमशः)

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