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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग १३/१६
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सुन्दर घृतई बंधि गयौ, धर्यौ डरी सौ नाम ।
ऐसैं रामहि जगत है, जगत देखिये राम ॥१३॥
ब्रह्म एवं जगत् की एकता के प्रतिपादक कुछ दृष्टान्त : जैसे लोक में दही के बिलोने पर डली(ग्रन्थि) रूप में निकले घी को 'मक्खन' कहते हैं, उसी को तप्त होने पर पिघल जाने पर 'घृत' कहने लगते हैं; उसी प्रकार यह राम(ब्रह्म) ही जगत् है तथा जगत् ही राम है ॥१३॥ (प्र०- सवैया : ३२/१५ छ०)
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सुन्दर पांनी तैं कछू, पाला भिन्न न होइ ।
ऐसैं जगत सु ब्रह्म है, जगत ब्रह्म नहिं दोइ ॥१४॥
जैसे शीत के कारण जमा हुआ जल ही 'वर्फ'(हिम) कहलाता है; उसी प्रकार इस जगत् एवं ब्रह्म में कोई द्वैत नहीं है ॥१४॥ (द्र० - सवैया : ३२/१५ छ०)
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सुन्दर नीर समुद्र कौ, जमि करि हूवौ लौंन ।
तैसैं यह सब ब्रह्म है, दूजा कहिये कौंन ॥१५॥
जैसे समुद्र का जल वायु के कारण जमकर 'सैन्धव लवण'(सैन्धा नमक) बन जाता है; वैसे यह ब्रह्म ही जगत् के रूप में परिवर्तित हो जाता है ॥१५॥ (द्र० - सवैया : ३२/१६ छ०)
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सुन्दर जैसैं लोह के, किये बहुत हथियार ।
ऐसैं यहु सब ब्रह्म है, जौ दीसै बिस्तार ॥१६॥
जैसे एक लोह धातु के अनेक शस्त्र अस्त्र बना लिये जाते हैं, वैसे ही यह समस्त जगद्विस्तार भी एक ब्रह्म से ही हुआ है ॥१६॥
(क्रमशः)

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