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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*तन मन चन्दन प्रेम की माला,*
*अनहद घंटा दीन दयाला ।*
*ज्ञान का दीपक पवन की बाती,*
*देव निरंजन पाँचों पाती ।*
*आनन्द मंगल भाव की सेवा,*
*मनसा मन्दिर आतम देवा ।*
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आरती ॥
*करि आरती आतमा ऊजली ।*
रामजी पधार्यौ म्हारै पुरवन रली ॥टेक॥
तीस समाणा ऊपरि चाढ़ी । चवर ढुलावै इक पग ठाढी ॥
पंच सबद घंटा निरबाणी । झालरि बाजै राम नाम बाणी ।
पाँच तत्व कौ दीपक धार्यौ । जोति सरूपी ऊपर बार्यौ ॥
दसवें द्वारै देव मुरारी । सन्मुख सुंदरि पूजणहारी ॥
मन पंडौ तिहि सेवा मांहीं । बषनां बारै आवै नांहीं ॥
इति श्रीबषनांजी की बाणी संपूर्ण भवेत् ॥
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घट-घट में रमने वाला राम मेरी मनोऽभिलाषाओं की पूर्ति करने हेतु मेरे हृदय रूपी घर में आया है । अतः हे निष्कल्मष उज्जवल आत्मा ! उसकी प्रसन्न मन से आरती उतार । उज्जवल आत्मा तेतीस कोटि देवताओं का शमन करके सर्वोच्चसत्ता सच्चिदानंदस्वरूप राम के स्थान में पहुँची है जहाँ वह अकेली अपने एक आश्रय से ही खड़ी-खड़ी चँवर ढोल रही है ।
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पाँच ज्ञानेन्द्रियों का समवेत राम नाम उच्चारण करना ही वहाँ बाण = कल्मष रहित घंटा ध्वनि है और रामनाम की अखंडध्वनि ही झालरों का बजना है । जल-पृथिवी-वायु-अग्नि-आकाशात्मक पंचतत्वों का ही वहाँ दीपक है(शरीर ही दीपक है) जिसको ज्योतिस्वरूप परब्रह्म-परमात्मा पर न्यौछावर किया गया है ।
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दशमद्वार = ब्रह्मरंध्र में मुरारी रूप परात्पर-परब्रह्म-परमात्मा विराजमान है जिसके सन्मुख आत्मा रूपी सुन्दरी पूजा हेतु खड़ी है । निष्पाप मन रूपी पुजारी उसकी सेवा में हाजिर है । बषनां कहता है, मैं सच्चिदानंद हुआ अब उस सच्चिदानंद के यहाँ से वापिस नहीं आ सकता । वह और मैं अब दो नहीं एक हैं ॥१६८॥
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इति श्रीबषनांजी की बाणी जयपुर नगर वास्तव्य प्रकाश-ताराचंद-सुत ब्रजेन्द्रकुमार सिंहल कृत “बखनां-वचनामृत-वर्षणी” टीका सहित सम्पूर्ण ॥ दिनाङ्क १०.०१.२००५ ई. तदनुसार पौष कृष्णा ३०, वि. सं. २०६१ सोमवार, प्रातःकाल ११ बजे ॥
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बषनां बाणी होय सरल टीका कै सारै ।
यौं कर मन संकल्प पाठ सोधन चित धारै ॥
दो पुस्तक मंगवाय पाठ कौ सोधन कीनौं ।
फिर टीका कौ काम कर्यौ सबकौ मन भीनौं ॥
ब्रजेन्द्र सिंहल नाम मम राम नाम बिसवास ।
प्रकास ताराचंद सुत मानसरोवर बास ॥१॥
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टीका के सहारे बषनांजी की वाणी को समझना सरल हो जायेगा, ऐसा मन में संकल्प उठा । एतदर्थ सर्वप्रथम पाठ शोधन करने का विचार मन में आया । तदर्थ दादूराम नरायना से वि. सं. १७८० व १७८५ में लिखी दो पुस्तकें मंगवाकर पाठ का शोधन किया । ततपश्चात् सभी के मन को भाने वाली टीका लिखी । रामनाम-विश्वासी मुझ टीकाकार का नाम ब्रजेन्द्रकुमार सिंहल है । मेरी माता प्रकाशदेवी तथा पिता ताराचंद सिंहल है । मेरा निवास मानसरोवर, जयपुर में है ॥१॥

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