बुधवार, 8 जुलाई 2026

२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग २९/३२

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२९. अद्वैत ज्ञान कौ अंग २९/३२
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लोक हाथ पर देखिये, ज्यौं सीतला सरीर । 
ऐसैं सुन्दर ब्रह्म तें, जगत भिन्न नहिं बीर ॥२९॥
जैसे हाथ पर हस्तरेखाएँ खिंची रहती हैं, या किसी के शरीर पर शीतलारोग(चेचक) के चिह्न(दाग) होते हैं, वहाँ हाथ का हस्तरेखाओं से तथा शरीर का चेचक के दाग से शरीर का भेद द्वैत नहीं है, यही तुलना ब्रह्म एवं जगत् में करनी चाहिये ॥२९॥ (द्र० - सवैया : ३२/१८ छ०)
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सुन्दर मैं संसार है, ज्यौं सरीर मैं अंग । 
हस्त पांव मुख नासिका, नैंन श्रवन सब संग ॥३०॥
इसी प्रकार ब्रह्म में संसार का तथा शरीर में अङ्गों का समन्वय समझना चाहिये; क्योंकि हाथ, पैर, मुख, नासिका, कान आदि ये सब शरीर के ही अङ्ग(अवयव) हैं ॥३०॥
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हस्त पांव अरु अंगुली, नैंन नासिका कांन । 
सुन्दर जगत सरीर ज्यौं, निंदै कौंन स्थांन ॥३१॥
अतः शरीर के इन अवयवों के समान जगत् की भी निन्दा कैसे की जा सकती है, जब कि जगत् भी ब्रह्म का ही अंश है ॥३१॥
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सुन्दर जिह्वा आपुनी, अपने ही सब दंत । 
जौ रसना बिदलित भई, तौ कहा बैर करंत ॥३२॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - जब कि इस शरीर में जिह्वा(जीभ) भी अपनी है, और दाँत भी अपने ही हैं; फिर भी कभी कभी दाँत जिह्वा को काट लेते हैं । अब वैर की बात किससे की जाय ! ॥३२॥
(क्रमशः)

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