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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*साभार सौजन्य ~ “श्रीमद् दादू पंथ प्रकाश”*
*श्रीमद्दादूपीठाधीश्वर(१९)श्री हरिरामजी महाराज का संक्षिप्त जीवन दर्शन~*
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*वैदुष्यपूर्ण धाराप्रवाही प्रवक्ता~*
आपके प्रखर वैदुष्य, साधना तथा कृतित्व का सर्वत्र प्रकाश हुआ और आपने श्रीमद्दादूवाणी, श्रीमद्भगवद्गीता । तथा श्रीमद्भागवत प्रभृति की कथाओं से जिज्ञासु व श्रोताओं की पिपासा को शान्त किया । अनेक प्रकाण्ड पण्डितों धर्माचार्यों जगद्गुरु शंकराचार्य पीठस्थ गुरुओं तथा अन्यान्य प्रबुद्ध मनीषियों के समुच्चय सम्मेलनों में आपने हर विषय को छुआ व पूर्ण प्रगल्भता, विद्वत्ता तथा संतवाणियों के माध्यम से समन्वयात्मक धाराप्रवाह उद्घोष किये, जिन्हें हृदयंगम का मंचस्थ धर्माचायों को भी कहना पड़ा~ “दादू पंथ के आचार्य इतने विद्वान् वक्ता तथा समन्वयक विवेचक तथा धाराप्रवाही है ? – यह हमें आज ही आचार्य श्री हरिराम जी महाराज का भाषण सुनकर ज्ञात हुआ ।” श्रोता समुदाय मंचासीन धर्माचार्यों की तालियों की बारम्बार गड़गड़ाहट आपके वक्तव्य की धारा को बाधित जरूर करती किन्तु साथ ही जय-जय ध्वनि से आपका अजस्त्र उद्बोधन उल्हास भर देता ।
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*दादूवाणीश्री के सशक्त वाचस्पति~*
आपने मध्यकालीन भक्तिधारा के महान् साधक संत सद्गुरु श्री दादूदयालजी महाराज की अनुभववाणी के सर्वाधिक वैशिष्ठ्य को सर्वत्र संत व विद्वत्समाज तथा आम जिज्ञासुजनों तक पहुँचाया । श्रीदादूवाणी में प्रयुक्त समस्त 10-12 भाषाओं के प्रयोजन को स्पष्ट करते हुये उन्होंने बताया कि जो भी भाषाभाषी सद्गुरुदेवश्री के पास जिज्ञासा से प्रश्न लेकर आया सद्गुरुदेव श्री ने उसे उसी की भाषा व भाव में उत्तर देकर उसके अन्तस् तो सन्तृप्त किया, अतएव वाणी श्री में विविध भाषाओं को स्थान मिला । यह सद्गुरुदेव श्रीदादूजी महाराज की उपदेश विधा की अप्रतिम सर्वग्राही शैली थी ।
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*दादूवाणीश्री की भाषा वैशिष्ठ्य का समाधान~*
श्रीदादूवाणी में प्रयुक्त प्रत्येक भाषा-यथा संस्कृत, हिन्दी, गुजराती, मराठी, सिंधी, पंजाबी, उर्दू, पारसी, मारवाड़ी, ब्रज तथा ढूँढड़ी के प्रकरणों को आप उसी वाक् विधा में उच्चारण कर तत्सम उसी भाषा के शब्दों के प्रयोग के साथ विशुद्ध व सर्वगम्य हिन्दी भाषा में व्याख्यायित कर विद्वत्समाज व जिज्ञासुजनों को हतप्रभ करते और पूर्ण आश्वस्त करते । आपका वाणी, भाषा तथा उच्चारण पर पूर्ण अधिकार था और बड़ी से बडी सभा के सभी श्रोताओं को सुस्पष्ट वाणी श्रवण के साथ ही श्रोता टस से मस न हों यह अनूठा-स्वाभाविक आकर्षण आपकी व्यक्तृत्व शैली में था ।

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