🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
*अपने सांई कारणै, क्या क्या नहिं कीजे ?*
*दादू सब आरम्भ तज, अपणा शिर दीजे ॥*
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मोतीरामजी = संतोषदासजी के पश्चात मोतीरामजी भी मांदी में प्रसिद्ध संत हुये हैं । वे नीमकाथाना के पास डाबला के क्षत्रिय सुने जाते हैं । ऐसा भी मांदी ग्राम के वृद्धों से मैंने स्वयं सुना है कि- मोतीरामजी पाटन नरेश के भाई बन्धुओं में थे । वे बाल ब्रह्मचारी, बलवान और भजनानन्दी संत थे ।
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आपने उदयपुर जमात में रहकर डांड पट्टे तथा पहलवानी सीखी थी । आपको लकड़ी चलाने का अच्छा अभ्यास था । पट्टे बाजी में आप माने हुये खिलाड़ी थे । आपका शरीर बहुत फुर्तीला था । सैकड़ों आदमियों को चीरकर बाहर निकल जाते थे । आप माँदी स्थान में रहते थे । आस-पास के ग्रामों के लोगों को मल्ल विद्या की शिक्षा भी देते थे तथा भजन भी करते थे ।
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एक समय मांदी ग्राम की खड़ी फसल को बनजारे चराने लगे । ग्राम के लोगों ने उनको रोका किन्तु वे नहीं रुके । उनके यूथ में भी बलवान् बंजारे थे ।ग्रामवाले मोतीरामजी के पास आये और कहा बनजारों से बहुत अनुनय विनय की किन्तु फिर भी वे नहीं, मानकर खड़ी फसल को नष्ट करा रहे हैं, कुछ लोग उनको रोकने गये थे उनको बनजारों ने पीटा भी है । अब हमारी बारह मास की रोजी केवल आपकी कृपा से बच सकती है ।
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मोतीरामजी को ग्राम-वासियों पर दया आ गई । वे बोले चिन्ता मत करो । भगवान् आपकी फसल की रक्षा करेंगे । फिर मोतीरामजी दादूजी तथा हनुमानजी को प्रणाम करके एक ढाल और दो लकडियाँ लेकर घोड़ी पर चढ़ खेतों में पहुंच गये । घोड़ी को खेजड़ी वृक्ष के बाँधकर, बनजारों को कहा~ तुमको दया नहीं आती, गरीब किसानों की खड़ी फसल नष्ट क्यों कर रहे हो ? अब यदि अपना भला चाहते हो तो शीघ्र बैलों की बालद को खेतों से निकाल कर चले जाओ ।
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मोतीरामजी के उक्त वचन सुनकर बनजारों ने उनका मजाक उड़ाया और कहा~ गांववालों की सहायता करने आया है, कहीं अपनी जान खो देगा । किन्तु मोतीरामजी डरनेवाले नहीं थे । उनका साहस देखकर बनजारों ने दो तीन युवकों को कहा- मोडे की अच्छी प्रकार खबर लो । यह सुनकर मोतीरामजी ने कहा, इनको क्या कहते हो तुम सब ही एक साथ आजाओ, इनको क्यों मरवाना चाहते हो ।
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फिर तो सब बनजारे मोतीरामजी पर टूट पड़े किन्तु मोतीरामजी बाल ब्रह्मचारी, लकड़ी की शिक्षा में निपुण पहलवान, तपस्वी और परोपकारार्थ आये थे । उनके साथी भगवान्, हनुमानजी व दादूजी थे । मोतीरामजी ने अनेक बनजारों को धराशायी कर दिया, शेष प्राण लेकर भाग छूटे । फिर कुछ बूढ़े बनजारे अपनी पगड़ी उतार कर दूर से रक्षा करो रक्षा करो पुकारते हुये आये और मोतीरामजी के चरणों में पगड़ियां रख कर क्षमा मांगने लगे ।
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तब मोतीराम जी ने कहा- बालद को खेतों से निकालो और आगे इस प्रकार किसी ग्राम में न करने की प्रतिज्ञा करो । बनजारों ने वैसा ही किया । उक्त प्रकार मोतीरामजी ने ग्राम की फसल की रक्षा की । यद्यपि वे भजनानन्दी संत थे तो भी आताताइयों को दंड देना उचित ही जान पडा तब ही उन्होंने ऐसा किया था । मोतीरामजी को मांदी ग्राम की जनता अब तक भी धन्यवाद देती है ।
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मोतीरामजी के भक्तरामजी हुये थे । वे भी दयालु संत थे । भूखों को अन्न देते थे, वस्त्रहीनों को वस्त्र देते थे । ये परोपकारी भजनानन्दी थे । इनके क्षमारामजी हुए । ये भी अपनी परंपरा की रक्षा करने वाले अच्छे संत हुये हैं । वर्तमान में आत्मारामजी हैं । उक्त प्रकार गरीबदासोतों के मांदी के थांमे में अच्छे अच्छे संत हुये हैं । वहां की जनता इस संत परंपरा पर पूर्ण श्रद्धा रखती है । इस परंपरा के संत भी सदा जनता के हित में ही रहते हैं ।
(क्रमशः)

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