सोमवार, 10 अगस्त 2026

३१. अन्योन्य भेद कौ अंग १३/१६

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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३१. अन्योन्य भेद कौ अंग १३/१६
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सुन्दर जैसैं पुरुष तैं, अंगुरी ह्वै चेतन्य । 
अंगुरी जंत्र बजावई, राग अन्य ही अन्य ॥१३॥ 
जैसे देह में पुरुष चेतन है, उस चेतन पुरुष के संसर्ग से देह की अंगुलि भी चेतन है । उस चेतन अंगुलि के माध्यम से उस जड़ वीणा के तारों से नानाविध राग निकलते हैं ॥१३॥
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पुरुष सु तौ चेतन्य है, अंगुरी अंतहकर्ण । 
सुंदर बाजै जंत्र तनु, शब्द कहै बहु बर्ण ॥१४॥ 
इसका अधिक विस्तार यह समझें - इस जड देह में पुरुष चेतन रूप से अधिष्ठित है । उसी के सम्पर्क से अन्तःकरण से अंगुलिपर्यन्त देह के सभी सूक्ष्म या स्थूल अवयव चेतनता धारण किये देह रूप वादय यन्त्र से समस्त(नानाविध) राग(कृत्य) उत्पन्न होते रहते हैं ॥१४॥ 
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सत अरु चित आनंदमय, ब्रह्म बिशेषण तीन । 
अस्ति भाति प्रिय आतमा, वहै बिशेषण कीन ॥१५॥ 
३. आत्मा के लक्षण : वेदान्तशास्त्र में ब्रह्म का परिचय तीन शब्दों से दिया है - १. सत्, २. चित् एवं ३. आनन्दमय । यहाँ सत् का अर्थ है - अस्ति(सदा वर्तमान = अविनाशी) । २. चित् का अर्थ है – भाति(अर्थात् शोभामय = सुन्दर) । एवं ३. आनन्दमय का अर्थ है – प्रिय('सत्यं शिवं सुन्दरम्' इस शब्दसमूह से भी इसी ब्रह्म का निरूपण है) ॥१५॥
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असत जानि जड दुःखमय, तीन बिशेषण देह । 
उपजै बर्तैं लीन ह्वै, सब बिकार कौ गेह ॥१६॥ 
देह का लक्षण : उसी शास्त्र में देह का परिचय इन तीन शब्दों से दिया है - १. असत्, २. जड, ३. दुःखमय । यहाँ असत् का अर्थ है - विनाशी(अस्थायी) । जड का अर्थ है - अचेतन(चेतनाविहीन) । एवं दुःखमय का अर्थ है - विविध विकारों वाला । इसी से यह १. उत्पत्ति, २. स्थिति एवं ३. विनाश - इन तीन स्थितियों में बदलता रहता है । यह देह सांसारिक सृष्टि का आश्रयस्थल कहलाता है ॥१६॥
(क्रमशः) 

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