गुरुवार, 13 अगस्त 2026

*२४. नाम महिमा का अंग ~१७/२०*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२४. नाम महिमा का अंग ~१७/२०*
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*नख शिख सूरत१ शुक्ल२ मध्य, मनसा वाचा मान ।*
*तैसे रज्जब नाम में, नाम धणी३ परवान४ ॥१७॥*
जैसे नख से शिखा पर्यन्त रूप१ को देखकर मन बलात काम२ में जाता है, वैसे ही मन वचन से नाम को ही यथार्थ३ रूप से नामी४ मानकर नाम में ही मन लगाना चाहिये ।
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*मूल डाल तरु बीज मधि, त्यों जन जगपति नाम ।*
*रज्जब रीझ्या देख कर, बडहु बडी निज ठाम ॥१८॥*
जैसे बीज में मूल, डाल आदि सभी वृक्ष रहता है, वैसे ही नाम में भक्त और भगवान दोनों ही रहते हैं, अर्थात नाम में भगवान् अर्थ रूप से व्यापक रूप से रहते हैं और भक्त का मन नाम में रहता है । इस नाम रूप स्थान को देखकर हम अति प्रसन्न हैं, हमारी नाम रूप जगह बड़े स्थानों से भी बड़ी है ।
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*रज्जब एकहि नाम मध्य, देखी दीरघ ठौर ।*
*संत अनन्त समाव हिं, अस्थल इसा न और ॥१९॥*
एक नाम ही अति विशाल जगह देखी है, जिसमे ज्ञानी योगी, भक्त, कर्मकाण्डी आदि अनन्त संत समाते हैं, अर्थात सभी नाम का चिन्तन करते हैं । नाम साधना के समान साधन रूप स्थान अन्य नहीं है ।
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*बडहुं बडा सांई सही, ताहि बडे सत साध ।*
*दोनों आये नाम में, रज्जब नाम अगाध ॥२०॥*
बड़े जो ब्रह्मादि है उनसे भी बड़ा परमात्मा है, परमात्मा से भी बड़े परमात्मा के प्यारे सच्चे संत हैं और परमात्मा की महिमा नाम में स्थित है, तभी तो नाम चिन्तन से प्रगट होती है, नाम की महिमा अगाध है ।
(क्रमशः)

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