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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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३१. अन्योन्य भेद कौ अंग २१/२४
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ताही तैं यह जीव है, अहं ममत जब होइ ।
भूलि गयौ निज रूप कौं, सुधि बुधि अपनी खोइ ॥२१॥
जब जीव की इस देह में 'मैं' या 'मेरा' यह ममता हो जाती है, तब यह जीव अपना वास्तविक शुद्ध बुद्ध रूप भूल कर सांसारिक प्रपञ्चों में फंस जाता है ॥२१॥
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जो कोई जिज्ञास ह्वै, सद्गुरु सरणै जाइ ।
सुन्दर ताहि कृपा करै, ज्ञान कहै समुझाइ ॥२२॥
ऐसी स्थिति आने पर यदि कोई जिज्ञासु साधक किसी सद्गुरु की शरण में पहुँचता है, तब वे सद्गुरु उस पर कृपा कर उस को ज्ञान (यथार्थता) का उपदेश करते हैं । उस को उस की वास्तविक स्थिति भली भाँति समझाते हैं ॥२२॥
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वा सौं सद्गुरु यौं कहै, समझि आपनौ रूप ।
सकल भेद भ्रम दूरि करि, तूं है तत्व अनूप ॥२३॥
वे सद्गुरु उस समय उसको यही उपदेश करते हैं - अरे भले आदमी ! तू अपना वास्तविक रूप समझ ! अपने सभी अज्ञानजन्य भ्रम दूर कर ले ! अरे ! तूँ तो शुद्ध बुद्ध निरञ्जन निराकार रूप अनुपम तत्त्व है, तेरा इस अज्ञान से क्या सम्बन्ध ! ॥२३॥
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अस्ति होइ सत रूप तब, भाति होइ चैतन्य ।
प्रिय पुनि ह्वै आनन्दमय, आतम ब्रह्म न अन्य ॥२४॥
तूँ 'सत्' होने के कारण सदा 'अस्ति'(अविनाशी) है । 'चित्' होने के कारण 'भाति'(सुन्दर तथा चेतन) है तथा ‘आनन्दमय’ होने के कारण सदा 'शिव'(प्रिय = मङ्गलमय) है । अतः हे आत्मा ! तूं ब्रह्मरूप है, अन्य नहीं ॥२४॥
(क्रमशः)

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