शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

*४६. परमारथ कौ अंग ३३/३६*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी, @Rgopaldas Tapsvi, बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
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*४६. परमारथ कौ अंग ३३/३६*
कहि जगजीवन रांमजी, दया धरम जहँ होइ ।
प्रेम भगति फूलै फलै, दुक्ख न व्यापै कोइ ॥३३॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि हे प्रभु जी जहाँ दया व धर्म होता है वहां भक्ति प्रेम फलता फूलता है और कोइ दुख नहीं व्यापता है ।
पर उपकारी गगन धर, पर उपकारी नीर ।
कहि जगजीवन पर उपकारी, दादूदास कबीर ॥३४॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि संत जन गगन जैसै परोपकारी होते हैं जो सब पर आवृत होता है जल प्रकाश वायु सभी देता है जल भी परोपकारी है संत दादू जी महाराज व कबीर साहिब भी परोपकारी संत है जो लोककल्याण की बात करते हैं ।
पर उपकारी आप हरि, अबिगत अलख अगाध ।
कहि जगजीवन पर उपकारी, रांम कहावै साध ॥३५॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि प्रभु परोपकारी है वे दिखते नहीं है वे जाने नहीं जा सकते उनका पार नहीं पा सकते, साधुजन भी परोपकारी हैं प्रभुमय हैं ऐसा मानते हैं ।
कहि जगजीवन बड़ ब्रिक्ष९. अलख उपावै१० आप ।
औरन कौं छाया करै, आप सहै सिर ताप११ ॥३६॥
(९. बड़ व्रिक्ष=बड़ा वृक्ष; २. वट वृक्ष)   (१०. उपावै=उत्पन्न करे)   (११. ताप=गरमी)      
संत जगजीवन जी कहते हैं कि वटवृक्ष जैसे लोक को प्रभु आप स्वयं उत्पन्न करते हैं, जो ऐसा परोपकारी है कि सबको शीतल छाया देकर स्वयं ताप सहता है ।
(क्रमशः) 

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