🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दादू जे नांही सो सब कहैं, है सो कहै न कोइ ।*
*खोटा खरा परखिये, तब ज्यों था त्यों ही होइ ॥*
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हरजीरामजी ने तोलारामजी की बात मान ली । हरजीरामजी जीवित राजा से नहीं मिल पाये । वह इनके पहुँचने से कुछ पहले ही मर गया था । फिर हरजीरामजी ने अपनी शक्ति से या अपनी आयु देकर किसी भी प्रकार राजा को जीवित कर दिया था । इससे खेतड़ी नरेश तथा खेतड़ी राज परिवार की आप पर बहुत श्रद्धा थी । इत्यादिक चमत्कार की कथा ये गौड़जी के गुढ़े में प्रसिद्ध है ।
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उस समय उस प्रदेश में दादू पंथी तीन संत सिद्ध पुरुष थे १~ हरजीरामजी २~ तोलारामजी और ३~ गौड़जी के गुढ़े से कुछ ही दूर भोड़की के परमहंसजी भी भी महान् संत थे । जब हरजीरामजी परमहंसजी से मिलने अपने स्थान से चलते तो महान् योगेश्वर परमहंसजी को अपनी योगशक्ति से ज्ञात हो जाता तब वे अपनी कालीभर से चल देते । दोनों की कुटियाओं के बीच मार्ग में नीम्बावाली स्थान पर मिल जाते । फिर कुछ देर हरिचर्चा सत्संग करके जाने लगते तब हरजीरामजी एक पैर ऊंचा उठाते और परमहंसजी मुख फाड़ देते । फिर अपने २ मार्ग से चल देते ।
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एक समय एक सत्संगी सज्जन ने जो कई बार आपके उक्त व्यवहार को देख चुका था, परमहंसजी से पूछा~ भगवन् ! हरजीरामजी के पैर ऊपर उठाने का और आपके मुख फाड़ने का आशय क्या है ? कृपा करके बताइये । परमहंसजी ने कहा~ हरजीरामजी का तात्पर्य है कि इस पैर को ऊंचा करता हूं इतनी देर में ही प्राण निकल जाता है । इसलिये कृपा रखना फिर मिलन का तो क्या भरोसा है । मेरा मुख फाड़ना का भी यही तात्पर्य है मैं मुख फाड़ कर उनका समर्थन करता हूँ कि आप ठीक ही कहते हैं, मुख फाड़ते हैं इतनी देर में श्वास निकल जाता है । अतः आप भी कृपा रखना ।
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इससे सूचित होता है कि दोनों ही संत परम विरक्त थे । विरक्त संतों की यही भावना रहती है । स्थान- प्रथम स्थान मालपर्वत की थूमड़ी(कुटिया) हैं । गढ़ी चोमू ठाकुर ने, बीच का महल, दादू मंदिर राजा रामसिंह जयपुर ने, जल के कुंड महारावल समोद ने बनाये । गुढ़ा ग्राम में तीन हवेली हैं, दस दुकानें हैं । ये सब भी भक्तों की ही बनाई हुई हैं । नारायणे में हरजीरामजी का चौभीता महल भी प्रसिद्ध है । हरजीरामजी के ब्रह्मलीन होने पर उनकी समाधि स्मारक रूप विशाल छत्री खेतड़ी नरेश ने बनवाई थी ।
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उस छत्री में शिलालेख है~
श्रीरामजी,
दोहा~ “सागर नागर कुल विषै, शुभ तनु परम उदार ।
श्री दादू भू विमल यश, भये अंस अवतार ॥१॥
ताके पंथ में अवतरे, सिद्ध दिगंबर धीर ।
वर श्री हरजीरामजी, नृप कुल अद्भुत वीर ॥२॥
भये तपो धन तेज धन, शोभा भई अपार ।
लोक राज पूजत भये, जानि धर्म निजसार ॥३॥
वृद्ध भये तन त्यागियो, भज श्री पति सुख सार ।”
इसका अगला पाठ ठीक पढ़ने में नहीं आया । हरजीरामजी की समाधि पर भादवा में मेला भरता है ।
(क्रमशः)

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