शनिवार, 15 अगस्त 2026

*२५. नाम निरूप आदम अकलि का अंग ~९/१२*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२५. नाम निरूप आदम अकलि का अंग ~९/१२*
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*सब ही नाम स्वभाव के, काढे अकलि विचार ।*
*जन रज्जब गुण गूंथ कर, जोड़े सहस हजार ॥९॥*
परमात्मा के सभी नाम स्वभाव, गुण तथा स्वरूपानुसार बुद्धि से विचार करके निकाले गये हैं और गुणों के द्वारा गूंथ करके तो बुद्धिमानों ने हजार हजार नाम जोड़कर सहस्त्र नाम स्तोत्रों की रचना की है ।
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*जेती हिकमत हुक्म में, ये सब तिसके नांउ ।*
*सब साहिब जिस नाम में, ताकि मैं बलि जांउ ॥१०॥*
जितनी ही विद्यायें उस प्रभु की आज्ञा में हैं, वे सभी उसके नाम हैं अर्थात गुण, कर्म और स्वभाव से बनने वाले नाम सब विद्या द्वारा ही बनते हैं, किन्तु प्रभु के जिस स्वरूपभूत निज नाम में सब कुछ आ जाता है, मैं उसी नाम की बलिहारी जाता हूँ ।
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*नाम निनामे१ के धरे, संतों शोध स्वभाय ।*
*रज्जब माने राम जी, सुमर्यां करी सहाय ॥११॥*
संतों ने परमात्मा के स्वभाव को विचार द्वारा खोजकर नाम-रहित१ के भी नाम रख दिये हैं रामजी ने भी उन्हें अपने नाम मानकर स्मरण करने वालों की सहायता की है ।
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*निराकार का नाम तन, अलिफ१ अलह औजूद२ ।*
*जन रज्जब यहु गहन गति, मालिक है मौजूद३ ॥१२॥*
निराकार परमात्मा का शरीर नाम ही है, फारसी का आदि अक्षर१ ही अल्लाह का शरीर२ है । परमात्मा नाम रूप से सब जगह विद्यमान३ है, किन्तु उनके स्वरूप को जानकर उनमें प्रवेश करना बड़ा कठिन है ।
(क्रमशः)

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