गुरुवार, 13 अगस्त 2026

३१. अन्योन्य भेद कौ अंग २५/२८

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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३१. अन्योन्य भेद कौ अंग २५/२८
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जीव भयौ अनुलोम तैं, ब्रह्म होइ प्रतिलोम ।
सुन्दर दारू जराइ कैं, अग्नि होइ निर्धोम ॥२५॥
रे जीवात्मा ! जैसे अग्नि काष्ठ को जला कर धूमरहित हो जाती है, वैसे ही जब तक तूं देह के संसर्ग में था, तब तक तूँ उसके अनुकूल(अनुलोम) था । अब तेरा देह से संसर्ग छूट जाने के कारण प्रतिकूल(प्रतिलोम) ब्रह्मरूप हो गया है । अब उस देह से तेरा कोई सम्बन्ध नहीं है, अतः तूं उसका ममत्व त्याग दे ॥२५॥
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गऊ देह कै मद्धि है, पय अरु उत्तम ज्ञान ।
सुन्दर घृत ज्यौं आतमा, ब्यापक एक समान ॥२६॥
४. गो-दुग्ध की उपमा से ज्ञानी की प्रशंसा : जैसे गौ के दूध में घृत सर्वत्र व्याप्त रहता है, उसी प्रकार ज्ञानी की देह में श्रेष्ठ आत्मा तथा उस का ज्ञान सर्वत्र व्यात है ॥२६॥
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चारि श्रवन जब नीरिये, बांट मनन अभ्यास ।
सुन्दर दुहिये धेनु कौं, सो कहिये निदिध्यास ॥२७॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - जैसे किसी गौ को, अधिक दूध की प्राप्ति के लिये पहले उसको उत्तम चारा(हरा घास) तथा बीट(खली, बिनौला, दाना) आदि खिलाया जाता है तब उससे दूध निकाला जाता; उसी प्रकार जिज्ञासु साधक को भी पहले गुरुपदेशश्रवण रूप चारा, तथा बांट(खाली, बिनौला आदि) रूप निराई(मनन) करने के बाद ही दूध निकालना रूप निदिध्यासन करना चाहिये ॥२७॥
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दुग्ध ज्ञान जब पाइये, जा मन निश्चै तात ।
सुन्दर दधि मथि अनुभवै, निकसै घृत साक्षात ॥२८॥
इस विधि से साधक को जब ज्ञानरूप दूध मिल जाता है, तब उसे 'जीव-ब्रह्म की एकता' का निश्चयात्मक ज्ञान हो पाता है । इस निश्चयात्मक ज्ञान के बाद जब वह साधक दूध रूप ज्ञान को दही के रूप में बार बार मथता है तब उसे घृतरूप ब्रह्म का साक्षात्कार होता है ॥२८॥
(क्रमशः)

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