गुरुवार, 13 अगस्त 2026

*२४. नाम महिमा का अंग ~३३/३५*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२४. नाम महिमा का अंग ~३३/३५*
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*काया काष्ठ में बंधी, देखो आज्ञा आगि१ ।*
*सो मुकती२ ह्वै रज्जबा, नाम अँगारे लागि ॥३३॥*
काष्ठ में अग्नि१ बँधा रहता है किन्तु अँगारा लगने पर काष्ठ जल कर वह अग्नि व्यापक अग्नि में लय हो जाता है, वैसे ही आत्मा को परमात्मा से मिलने की आज्ञा होने पर भी वह देहाध्यास के कारण शरीर में बद्ध है किन्तु निरंतर नाम-स्मरण होने से वह खुल२ जाती है, अर्थात नाम-स्मरण द्वारा ज्ञान होकर आत्मा परमात्मा में अभेद रूप से मिल जाता है ।
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*कर्म काष्ठ कहु क्या करे, जब प्रकटे पावक नांउ ।*
*अठारह भार अघ दहम१ ह्वै, बासदेव२ बलि जांउ ॥३४॥*
जैसे अठारह भार वनस्पति रूप काष्ठ अग्नि के आगे क्या जोर कर सकता है, वह तो भस्म ही हो जाता है वैसे ही नाम-स्मरण द्वारा ज्ञानाग्नि प्रकट होने पर कर्म क्या कर सकते हैं ? वे तो भस्म१ ही हो जाते हैं उस ज्ञानाग्नि२ की हम बलिहारी जाते हैं ।
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*प्रतिमा१ पूजा नाम धरि, नाम तिरे पाषान ।*
*सोई नाम नर उर बस्या, सीझे२ क्यों न सुजान ॥३५॥*
राम कृष्णादि नाम रखने पर ही मूर्ती१ की पूजा होती है, बिना नाम धरे तो कोई भी नहीं पूजता और नाम अंकित होने पर ही सेतु बाँधने के समय पत्थर जल पर तिरे थे । हे बुद्धिमान् ! राम-नाम मनुष्य के हृदय में निरंतर बसा रहे तो यह सिद्धावस्था२ मुक्ति को क्यों नहीं प्राप्त होगा ? अर्थात होगा ही ।
इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित “२४. नाम महिमा का अंग” समाप्त ॥
(क्रमशः)

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