गुरुवार, 13 अगस्त 2026

*२४. नाम महिमा का अंग ~२९/३२*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२४. नाम महिमा का अंग ~२९/३२*
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*नाहर१ जरख सु मंत्र वश, अबला२ ह्वै असवार ।*
*तो नाम लेत नर नेह सौ, क्यों ना ह्वै करतार ॥२९॥*
बाध१ और जरख भी मंत्र के अधीन हो जाते हैं और उनपर डाकिनी नारी२ बैठकर घूमती है, तो फिर स्नेह पूर्वक ईश्वर का नाम जपने से ईश्वर क्यों न अनुकूल होंगे ?
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*जन जगपति के मध्य मन, द्वै दिशि जीव इक नांउ ।*
*रज्जब राखे नाम मन, तिनकी मैं बलि जांउ ॥३०॥*
भक्त और भगवान् दोनों के मन में एक नामरूप जीव है, अर्थात भक्त भी नाम के आश्रय जीवित रहता है और भगवान के अस्तित्त्व का भी बोध नाम से ही होता है, ऐसे नाम में जो निरंतर अपना मन रखते हैं, मैं उनकी बलिहारी जाता हूँ ।
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*नाम निरंजन जीव है, सो साधु मध्य श्वास ।*
*तो रज्जब हरि क्यों रहे, बिन आये उन पास ॥३१॥*
नाम ही निरंजन राम का जीव है और वह संत के प्रति श्वास के साथ रहता है, अर्थात निरंतर स्मरण रहता है, तो फिर उन संतों के पास आये बिना हरि कैसे रह सकते हैं ?
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*नाम नाज जीवन सबहुं, आदम१ की औलाद२ ।*
*और हु और अहार है, देखर४ दीज्यो दाद३ ॥३२॥*
आदि मानव१ की संतान२ मनुष्य जाति का, भगवान नाम स्मरण रूप नाज ही जीवन है, अर्थात नाम-स्मरण बिना मानव में आत्म-बल की वृद्धि नहीं होती । अन्य पशु, जाति आदि का आहार अन्य वस्तुएँ है, अत: नाम का स्मरण करके नाम-स्मरण द्वारा प्राप्त आत्म-बल को प्रत्यक्ष देखकर४ के साधक को स्मरण की प्रशंसा३ अवश्य करनी चाहिये ।
(क्रमशः)

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