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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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३१. अन्योन्य भेद कौ अंग २९/३२
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सुन्दर या अनुक्रम बिना, ज्ञान प्रगट नहिं होइ ।
बात कहें का होत है, भ्रम मति भूलै कोइ ॥२९॥
ज्ञानप्राप्ति की इस विधि के बिना जिज्ञासु साधक को आत्मज्ञान नहीं प्राप्त हो सकता । वैसे, इस ज्ञानप्राप्ति के लिये नाना उपदेशक दूसरे प्रकार की अन्य विधियाँ(बातें) बताते हैं; परन्तु उनकी ये बातें(उपदेश) भ्रममात्र हैं । इनसे आत्मज्ञान कथमपि नहीं प्राप्त हो सकता । अतः कोई जिज्ञासु साधक ऐसे भ्रान्त उपदेशों के भ्रम में न पड़े ॥२९॥
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क्रिया करत है बहुत विधि, ज्ञान दृष्टि जो नांहिं ।
अंध चल्यौ मग जात है, परै कूप के मांहिं ॥३०॥
ज्ञानविहीन साधक : अनेक भ्रान्त साधक मिथ्यागुरु के मिथ्या उपदेश के आश्रय से साधना(क्रिया) करने लगते हैं; परन्तु उन को बहुत श्रम करने पर भी ज्ञानदृष्टि उद्भुत नहीं हो पाती । ऐसे साधक की वही दशा होती है जैसे कोई अन्धा(नेत्रविहीन) पुरुष, मार्ग में चलते चलते, सामने आये कूप में जा गिरे ॥३०॥
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ज्ञान दृष्टि करि निपुनि है, क्रिया नहीं पग दौर ।
अग्नि लगै जब सदन मैं, पंगु जरै वहि ठौर ॥३१॥
क्रियाविहीन साधक : तथा जिस मिथ्या साधक को साधना द्वारा ज्ञानदृष्टि तो उद्भूत हो गयी, परन्तु उसकी क्रियाएँ तदनुकूल नहीं हैं तो उसकी भी वही दशा होगी जैसे कोई पुरुष, घर में अग्नि लग जाने का ज्ञान होने पर भी उससे बाहर निकलने की कोई क्रिया(प्रयास) न करे । अन्त में, वह वहीं जल कर मर जाता है ॥३१॥
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ज्ञान क्रिया दोऊ मिलहिं, तबही होइ उबार ।
यथा अंध के कंध पर, पंगु होइ असवार ॥३२॥
ज्ञान एवं क्रिया समन्वित साधना से ही मोक्षप्राप्ति : अतः आत्मज्ञान की साधना में वही साधक सफल माना जाता है, जिसकी साधना में ज्ञान एवं क्रिया दोनों सम्मिलित हों । जैसे कोई पंगु(क्रियाविहीन, परन्तु ज्ञानवान्) पुरुष अन्धे(ज्ञानरहित परन्तु क्रियावान्) पुरुष की पीठ पर चढ कर दुर्गम मार्ग पार कर लेता है । (क्रिया एवं ज्ञान का मिश्रण ही सफलता प्रदान करता है । ज्ञानं भारः क्रियां विना) ॥३२॥
(क्रमशः)

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