*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२४. नाम महिमा का अंग ~५/८*
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*निश्चल ह्वै नाम हिं भजे, एक मुहूरत मन्न ।*
*ता शम कृत मन सब कहैं, वेद रु वेत्ता जन्न ॥५॥*
एक घंटा वा एक क्षण भी जिसका मन निश्चल होकर राम का भजन करता है, तो उसने अपने मन को जीता है, ऐसा वेद तथा सभी विद्धान कहते हैं ।
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*महन्त मुखों सेती१ सुन्या, रज्जब भजन प्रताप ।*
*ज्यो माया२ सौ माया उदय, त्यों नाम निरंजन आप३ ॥६॥*
जैसे पैसे२ से पैसा बढ़ता है, वैसे ही निरंजन ब्रह्म के नाम-चिन्तन से ब्रह्म३ प्राप्त होता है, ऐसा ही भजन का प्रताप महान् संतों के मुख से१ सुना है ।
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*बहु विद्या हूनर१ बहुत, सुमिरण सम नहिं कोय ।*
*रज्जब गुण२ गुण सौं मिले, नाम सु नरहरि३ होय ॥७॥*
विद्या और गुण१ तो बहुत है किन्तु हरि-नाम-स्मरण के समान कोई नहीं है, कारण विद्या और गुणों से तो सांसारिक विषय२ ही प्राप्त होते हैं और नाम-स्मरण से ब्रह्म को प्राप्त होकर ब्रह्म३ ही हो जाता है ।
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*अज्ञान कष्ट सब शक्ति१ में, शिव२ सेवा हरि नाम ।*
*ज्यो भृत३ भामिनि राज घर, सुत संपद् द्वै ठाम ॥८॥*
जैसे दास३ की नारी दासी राजा के घर में रहती है किन्तु उसका पुत्र और भूषणादि धन तथा राज-महल दोनों स्थानों में रहता है, वैसे ही जीवात्मा शरीर में रहता है किन्तु उसका मन और प्रेम माया१ में तथा हरि नाम दोनों में रहता है, माया में रहता है तब तो अज्ञान जन्य कष्ट मिलता है और हरि नाम में रहता है तब ब्रह्म की भक्ति द्वारा ब्रह्म२ को प्राप्त होता है ।
(क्रमशः)

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