*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*२४. नाम महिमा का अंग ~१/४*
इस अंग में नाम महिमा सम्बन्धी विचार करेंगे -
.
*नमो नाम सम कुछ नहीं, साधु वेद मत माँहिं ।*
*तीरथ व्रत न योग यज्ञ, पटतर कहे न जाँहिं ॥१॥*
संतों तथा वेद मत का विचार करने पर ज्ञात होता है कि - ईश्वर नाम स्मरण के समान कोई भी साधन नहीं है, फिर तीर्थ, व्रत, योग और यज्ञ तो उसके समान कैसे कहे जा सकते हैं, उस नाम को हम नमस्कार करते हैं ।
.
*अर्ध नाम सम कुछ नहीं, जप तप तीरथ दान ।*
*षट् कर्म कष्ट रु साधना, समसरि१ नाम न जान ॥२॥*
परमात्मा के आधे नाम के समान भी कुछ नहीं है । जप, तप, तीर्थ, दान तथा ब्राह्मणों के षटकर्म-यजन, याजन, अध्यन, अध्यापन, दान देना और नाना साधन रूप कष्ट नाम-स्मरण के समान१ नहीं जानना चाहिये ।
.
*नाम ठाम रोके न कोई, जप तप तीरथ दान ।*
*रज्जब साधन कष्ट सब, सुमिरण सम न बखान ॥३॥*
नाम के स्थान को कोई भी नहीं रोक सकता अर्थात नाम की समता कोई भी नहीं कर सकता, जप, तप, तीर्थ स्नान, दान और भी नाना साधन रूप कष्ट ये सब नाम-स्मरण के समान नहीं कहे जाते ।
.
*सकल धर्म हरि नाम मधि, जप तप तीरथ दान ।*
*ज्यों रज्जब वृक्ष बीज में, बाहर द्रसे१ न पान ॥४॥*
जैसे सारा वृक्ष बीज में होता है, बाहर एक पत्ता ही नहीं दिखता१ वैसे ही संपूर्ण धर्म तथा जप, तप, तीर्थ, हरि नाम-स्मरण में आ जाता है, बाहर नहीं रहते अर्थात सबका फल नाम-स्मरण से प्राप्त हो जाता है ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें