शनिवार, 15 अगस्त 2026

कृष्णदेवजी की शिष्य परंपरा

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दादू अंतरगति आपा नहीं, मुख सौं मैं तैं होइ ।*
*दादू दोष न दीजिये, यों मिल खेलैं दोइ ॥*
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रामनारायणजी महान् वैद्य हुये, साखून के स्थान में दीक्षित थे । राजा रामसिंहजी के समय में जयपुर आ गये थे । जयपुर में इनको राजवैद्य की पदवी प्राप्त हुई थी तथा जयपुर राज्य के एक गुढा कुमावतन ग्राम भी इनको प्राप्त हुआ था । मोजीरामजी साखून में जाकर बसे और अच्छी ख्याति प्राप्त की । साखून में एक पीढी ही रहे । पश्चात् बुधरामजी के समय में जयपुर पुराणी बस्ती में आ गये । वहां स्थान अब भी है ।
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रामनारायणजी ने महाराजा माधोसिंह का इलाज किया था । इसके फलस्वरूप में ही वि. सं. १९४७ में ग्राम गुढा कुमावतान तन कालख पट्टा जागीर माफी दिया था । आप राजकीय औषधखाना के मुखिया वैद्य थे । आप स्थान पर भी धमार्थ औषधालय चलाते थे, जो अब तक चल रहा है । अब भी रामनारायण औषधालय के नाम से १५००) रु. लगभग सरकारी सहायता मिलती है । आपको राज्य दरबार में ताजीमी कुर्सी मिलती थी ।
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अपने स्थान से दरबार व राजकीय औषधखाना जाने आने के लिये राज्य से एक भैल(बैलगाड़ी) का प्रबन्ध था । आप पूर्वाश्रम में ब्राह्मण थे । और ईसरदा के थे । इसमें माधोसिंहजी के पूर्व परिचितों में से थे । आपने वि. सं. १९६० ज्येष्ठ कृष्णा ८ को देह छोड़ा था । आप के स्थान में अब वैद्य भजनदासजी आयुर्वेद, व्याकरण, वेदान्तचार्य दादू महाविद्यालय जयपुर के स्नातक हैं । आपका स्थान जाट के कुए का रास्ता पुराणी बस्ती, चांदपोल बाजार में रामनारायण धर्मार्थ औषधालय जयपुर है । २- नारायणा ३- गुढा कुमावतान ( कालख ) आपके कृषि भूमि है ।
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६ कृष्णदेवजी की शिष्य परंपरा = गंगारामजी = १- क्षत्रियों के महन्त गंगारामजी~ आचार्य कृष्णदेवजी महाराज के ब्रह्मलीन होने पर मेड़ता में आचार्य गद्दी पर चैनरामजी महाराज को संपूर्ण भेष तथा मारवाड़ के राजाओं तथा प्रजा ने बैठाया था । किन्तु नारायणा में गंगारामजी के गुरु भाई कृपारामजी, नागेसंत तथा जयपुर नरेश ने गंगारामजी को गद्दी पर बैठाया था । फिर मतभेद समाप्त होने पर समाज ने आचार्य चैनरामजी से प्रार्थना की~आप अब नारायणा दादूधाम में पधारें ।
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चैनरामजी ने कहा~वहां गंगारामजी को गद्दी पर बैठाया गया, वे गद्दी से कैसे हटेंगे । समाज के मुख्य २ व्यक्तियों ने कहा~उनको हम गद्दी छोड़ने के लिये प्रार्थना करेंगे और वे अवश्य समाज की प्रार्थना से गद्दी त्याग देंगे । तब चैनरामजी महाराज ने कहा उनकी कुछ मर्यादा व प्रतिष्ठा भी रहनी चाहिये । इसके लिये मैं समाज से निवेदन करूंगा कि हमें आचार्यों की स्मारक छत्रियां बनानी हैं । उनका उनको महन्त बनाकर उनकी प्रतिष्ठा रखी जाय । इस पर वे प्रसन्नता से गद्दी त्याग दें तो मैं नारायणा अवश्य चलूंगा ।
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समाज के मुख्य २ महानुभाव नारायणा में आये और उनको चैनरामजी महाराज ने जैसा कहा था, वैसा ही उन्होंने गंगारामजी को कहा । गंगारामजी ने उक्त व्यवस्था होने की बात सुनकर सहर्ष गाद्दी त्याग दी । फिर महाराज चैनरामजी नारायणा पधारे और आचार्य जयतरामजी तथा अपने गुरुदेव कृष्णदेवजी की संयुक्त छत्री बनाई और उसकी प्रतिष्ठा करके गंगारामजी को छत्रियों के महन्त बना दिये । नारायणा में सर्वप्रथम उक्त छत्री ही बनी थी । इससे पूर्व के आचार्यों के चरणचिन्ह भैराणा में हैं, नारायणा में नहीं हैं ।
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जयतरामजी महाराज तथा कृष्णदेवजी महाराज के संयुक्त चरणचिन्ह जिस छतरी में हैं, उसके ठीक पश्चिम में जो स्थान है वही छत्रियों के महन्तों का स्थान है । उसी में गद्दी लगा कर गंगारामजी विराजते थे । छड़ी चंवर आदि महन्तों के चिन्ह उनको दिये गए थे । आचार्यजी के पास छत्रियों के महन्त आते हैं तब आचार्यजी को दंडवत करते हैं और आचार्यजी खड़े होकर उनसे मिलते हैं ।
(क्रमशः)

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