🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*https://www.facebook.com/DADUVANI*
*श्रद्धेय श्री @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी, @Rgopaldas Tapsvi, बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
.
*४६. परमारथ कौ अंग २५/२८*
.
कहि जगजीवन रामंजी, दया धरम व्रिधि१२ होइ ।
सत संतोष लिया रहै, दुक्ख न व्यापै कोइ ॥२५॥
(१२. व्रिधि-वृद्धि)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि स्मरण से दया धर्म की वृद्धि होती है । सत्य व संतोष धारण करनेवाले को कभी कोइ कष्ट नहीं व्यापता है ।
.
कहि जगजीवन रांमजी, दया धरम तहां नांम ।
जहां नांम तहां निरंजन, निरख नूर सब ठांम ॥२६॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि हे प्रभु जिस स्थान पर दया है, धर्म है, वहाँ प्रभु नाम भी है । जहाँ प्रभु का नाम है वहां स्वयं निरंजन देव विराजते हैं उनके तेजोमय रुप को सब स्थानों पर देखा जा सकता है ।
.
कहि जगजीवन धरम की, धजा निरंजन राइ ।
रांम करावै सौ करै, मन वांछित फल खाइ ॥२७॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि धर्म ध्वज निरंजन देव से ही है वे ही इसके राजा हैं जो प्रभु करवाते हैं वह ही होता हैं और ऐसा माननेवाले सदा मनोवांछित फल पाते हैं ।
.
कहि जगजीवन धरम की, वाड़ि१ करी कर बाहि ।
करता पुरिष समीप करि, रोम करावै आइ ॥२८॥
(१. बाड़ि-बांध, रोक)
संत जगजीवन जी कहते हैं कि धर्म प्रवाह को प्रभु प्रमाद से बचाने के लिये बांध बना कर रोकते हैं फिर बहाते हैं, संयम से प्रसार करते हैं । उन परमात्मा की कृपा जब समीप होती है तो रोम जैसे लघु जन भी कर पाते हैं ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें