🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार : Subhash Jain*
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*मारग को सूझे नहीं,*
*दह दिशि माया जाल।*
*काल पाश कसि बाँधियो,*
*मेरे कोइ न छुड़ावणहार॥*
*राम बिना छूटे नहीं,*
*कीजे बहुत उपाय।*
*कोटि किये सुलझे नहीं,*
*अधिक अलूझत जाय॥*
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एक हरे-भरे शहतूत के वृक्ष पर रेशम के एक छोटे से कीड़े ने जन्म लिया। कोमल पत्तियों को खाते-खाते जब उसका उदर भर गया, तो उसने अपने चारों ओर सुरक्षा और सुख का एक सुंदर संसार रचने का विचार किया।
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उसने अपने ही मुख से एक चमकीला, महीन और अत्यंत चिकना रेशमी धागा निकालना आरंभ किया। वह बड़े आनंद से अपने शरीर के चारों ओर उस सुंदर तार को लपेटने लगा। ज्यों-ज्यों धागा लिपटता गया, उसे वह स्पर्श अत्यंत कोमल, गर्म और सुरक्षित लगने लगा। वह मन ही मन मुदित होकर सोचने लगा— "अहा ! यह तो मेरा अपना राजमहल है। यहाँ न आँधी का डर है, न धूप का कष्ट और न ही किसी शिकारी पक्षी का भय। इस विलासपूर्ण सुख से बढ़कर संसार में और क्या हो सकता है ?"
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क्षणभंगुर सुख और सुरक्षा के इस मोह में पड़कर वह अभागा जीव अपने ही भीतर से धागा निकाल-निकाल कर जाल बुनता रहा। वह इतनी तन्मयता से अपने ही महल की दीवारों को मोटा और घना करता गया कि उसे भान ही नहीं रहा कि वह जिस रचना को अपना आश्रय समझ रहा है, वह धीरे-धीरे उसकी साँसों को अवरुद्ध करने वाला कारागार बनती जा रही है।
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अंततः वह रेशमी धागों के उस सघन खोल(कोकून) के भीतर पूरी तरह कैद हो गया। बाहर निकलने का न कोई मार्ग बचा और न ही पंख फैलाने का कोई स्थान।
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तभी वहाँ रेशम का एक व्यापारी आया। उसने उस खूबसूरत, भारी और चमकीले कोकून को वृक्ष से तोड़ा और रेशम का धागा प्राप्त करने के लिए उसे सीधे खौलते हुए गर्म जल के पात्र में डाल दिया। जिस रेशमी आवरण को उस कीट ने जीवन भर बड़े चाव और जतन से रचा था, उसी के भीतर तड़पकर उसके प्राण समाप्त हो गए।
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संसार का अज्ञानी मनुष्य भी इसी रेशम के कीड़े की भाँति है। वह अपने ही भीतर से कामना, मोह, वासना, परिग्रह और अहंकार के धागे निकालता है और अपने चारों ओर सांसारिक सुख-सुविधाओं का एक सघन जाल बुन लेता है। वह अपनी बनाई इस संकुचित परिधि को ही अपना वास्तविक जीवन और परम सुरक्षा मान बैठता है।
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किंतु वह यह भूल जाता है कि जिन भौतिक बंधनों को वह जीवन भर संवारता रहा, वही आसक्तियाँ अंततः काल और मृत्यु के समक्ष उसकी मुक्ति का सबसे बड़ा अवरोध बन जाती हैं। अपनी ही बनाई आसक्तियों के इस जाल को विवेक की धार से समय रहते काटकर ईश्वर के चरणों में समर्पित हो जाना ही इस भवसागर से पार पाने का सच्चा मार्ग है।

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