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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री @महन्त रामगोपालदास तपस्वी तपस्वी, @Rgopaldas Tapsvi, बाबाजी के आशीर्वाद से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ @Premsakhi Goswami*
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*४६. परमारथ कौ अंग ४५/४८*
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कहि जगजीवन आश्रम, करम रहत क्रित धांम ।
सोइ सुफल ग्रिह देखिये, जहां साध बिराजै रांम ॥४५॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि जहाँ आश्रम हो वहां हेतू किये गये कार्य किसी तीर्थ की सेवा से होते हैं । और उनके सुफल ही है कि वहां सकल मनोरथ दायक साधुजन विराजते हैं ।
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पत्र पुहुप फल जल हि करि, साध समागम आइ ।
कहि जगजीवन भाव हरि, रांम भगति रस पाइ ॥४६॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि साधु जन के सत्संग समागम के बाद भी यदि जीव बाह्य साधन पत्र पुष्प फल जल जैसे साधनों से ही तुष्ट हो जाये यह उचित नहीं हैं साधु संगति से तो हरि भाव आते हैं भक्ति रसरुप सार मिलता है ।
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जे कुछ करै या खावै पीवै, दे लै देखै आइ ।
कहि जगजीवन रांम समरपै, परमेसुर के भाइ ॥४७॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि सारी क्रियाओं को जो प्रभु समर्पित हो कर करे वह प्रभु को अति प्रिय है ।
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कहि जगजीवन धरम रस, धरम ग्यांन जस नांम ।
धरम भाव निरमल भगति, जा थैं परसै रांम ॥४८॥
संत जगजीवन जी कहते हैं कि धर्म का सार, ज्ञान यश नाम धर्म का तो भाव ही निर्मल है उस भक्ति से प्रभु सानिध्य मिलता है ।
(क्रमशः)

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