*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२४. नाम महिमा का अंग ~२५/२८*
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*नमो नाम महिमा अंनत, बोध न वाणी माँहिं ।*
*रज्जब कहिये कौन विधि, अकल कह्या नहीं जाहि ॥२५॥*
नाम की महिमा अनन्त है, उसे कह सके ऐसा ज्ञान वाणी में तो है ही नहीं फिर किस प्रकार कही जा सकती है ? निज नाम कला विभाग से रहित है अत: उसका यश नहीं कहा जा सकता, हम तो नाम को नमस्कार ही करते हैं ।
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*रज्जब रंचक भजन की, महिमा कही न जाय ।*
*अर्ध नाम पशु१ उद्धरे, नर देखो निरताय२ ॥२६॥*
किंचित मात्र भजन की भी महिमा नहीं कही जा सकती, हे नरो ! विचार करके देखो तो सही आधे नाम के उच्चारण से भी गजराज१ का उद्धार२ हो गया ।
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*आदम१ ईदम२ औलिया३, गहिये अगह अलाह ।*
*सिफत४ नाम की क्या कहूँ, बन्ध अबन्धू बाह५ ॥२७॥*
नाम-समरण की महिमा४ मैं क्या कहूँ, नाम - स्मरण करके यह२ मनुष्य१ संत३ बन जाता है, न ग्रहण किया जाय उस ब्रह्म को आत्मा रूप से ग्रहण करता है, और संसार बन्धन में बँधे हुये प्राणियों को मुक्त कर के धन्य५वाद का पात्र होता है ।
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*सारंग१ सर्प शिशु स्वर सुनत, मगन होत मुर२ मान ।*
*त्यों जगदीश्वर जाप वश, जन रज्जब जिव जान ॥२८॥*
मृग१, सर्प और बच्चा ये तीनों२ वीणा आदि बाजों के स्वर को सुन कर प्रसन्न होते हुये बजाने वाले के अधीन हो जाते हैं, वैसे ही ईश्वर जीव द्वारा किये गये नाम जाप को जानकर प्रसन्न होते हैं और उसके अधीन हो जाते हैं, अर्थात उसकी इच्छानुसार व्यवहार करते हैं, यह यथार्थ ही मानना चाहिये ।
(क्रमशः)

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