शनिवार, 19 सितंबर 2026

*४७. अध्यातम कौ अंग ४१/४४*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४७. अध्यातम कौ अंग ४१/४४*
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कहि जगजीवन संजमी, हरी भजि रांम अगाध ।
सात द्वीप नौ खंड मैं, एक कोइ कै आध ॥४१॥
संत जगजीवन जी कहते हैं संयमी बन कर अगाध राम-हरि को भजो । सात द्वीप और नौ खंड में ऐसा कोई बिरला ही है जो आधा भी भजता हो, अर्थात् सच्चा भक्त बहुत ही दुर्लभ है ।
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कहि जगजीवन जुगत मंहि, भाव भगति जस जोग ।
रांम ह्रिदै महिं राखि हरि, कदै न व्यापै रोग ॥४२॥
संत जगजीवन जी कहते हैं युक्ति के साथ भाव-भक्ति जैसा योग करो । हरि राम को हृदय में रखो, तो कभी कोई रोग नहीं व्यापेगा ।
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कहि जगजीवन तेज मंहि, सेज तिरै ज्यूं नांव ।
भगति अखंडित सो करै, जा के पूरे भाव ॥४३॥
संत जगजीवन जी कहते हैं तेज के भीतर वह इस प्रकार है जैसे पानी पर नाव तिरती है । अखण्ड भक्ति वही कर पाता है जिसके भाव पूरे होते हैं ।
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कहि जगजीवन उनमनी१, उपजै जोग जुगति ।
कोइ जन जाणैं जौहरी, हरि भजि हरि की गति ॥४४॥
(१. उनमनी=चित्त की एकाग्र अवस्था)
संत जगजीवन जी कहते हैं उनमनी अवस्था में योग की युक्ति उपजती है । कोई जौहरी जैसा पारखी जन ही हरि को भज कर हरि की गति को जानता है ।
(क्रमशः) 

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