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*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४७. अध्यातम कौ अंग ६६/६८*
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कहि जगजीवन अग्यारस३, बारस४ मांही भेद ।
तेरस५ तिस घर समावै, चौदस६ चार्यूं वेद ॥६५॥
(३. अग्यारस=एकादशी) (४. बारस=द्वादशी) (५. तेरस=त्रयोदशी) (६.चौदस=चतुर्दशी)
जगजीवनदास जी महाराज चेतना की सीढ़ियाँ बता रहे हैं ।
*अग्यारस(एकादशी)* - हमारे शरीर में १० इंद्रियाँ + १ मन = ११ हुए । जब तक मन और इंद्रियाँ अपनी-अपनी ओर भाग रही हैं, तब तक जीव ग्यारह में ही अटका है ।
*बारस(द्वादशी)* - जब इन ग्यारह से आगे १२ वाँ - बुद्धि या विवेक जागता है, तब भेद दिखने लगता है - क्या अपना है, क्या पराया, क्या जड़ क्या चेतन । यहीं से साधक में भेद-बुद्धि आती है ।
*तेरस(त्रयोदशी)* - तेरस पर वह भेद मिट जाता है । साधक "तिस घर" - उस अपने निज घर में, उस दसवें द्वार वाले घर में समा जाता है । जैसे आपने पहले कहा था - मछली पानी में ही समा जाए ।
*चौदस(चतुर्दशी)* - जब वह अपने घर में समा गया, तब चारों वेद - यानी सारा ज्ञान, सारे शास्त्र, सारा पढ़ा-सुना - उसी में समा जाता है । अब बाहर के वेद पढ़ने की जरूरत नहीं, भीतर ही सब प्रकट हो जाता है । ग्यारह में जीव, बारह में भेद, तेरह में निज घर, चौदह में सब वेद उसी में लय ।
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पून्यूं७ पुण्य पवित्र तन, राम नाम रस लीन ।
कहि जगजीवन मिलि रहै, ज्यूं जल मांहै मीन८ ॥६६॥
(७. पून्यूं=पूर्णिमा) (८. मीन=मछली)
जगजीवन जी महाराज के इस दोहे में दो बहुत मीठी बातें हैं -
*१. पून्यूं पुण्य* - चौदस तक ज्ञान हुआ, पर पूनम पर पूर्णता होती है । जब बहुत जन्मों के पुण्य इकट्ठे होते हैं, तब यह तन पवित्र होता है । और पवित्र तन की पहचान क्या ? वह राम नाम के रस में लीन हो जाता है । जैसे मिश्री पानी में घुल जाती है, वैसे तन नाम में घुल जाता है ।
*२. ज्यूं जल मांहै मीन* - आपने पहले भी मछली का उदाहरण दिया था । यह बाबा जी का सबसे प्रिय उदाहरण है । मछली जल से अलग होकर जी नहीं सकती, और जल में रहकर भी वह जल से अलग नहीं दिखती । वैसे ही जब तन राम-नाम-रस में पवित्र हो जाता है, तो वह हरि में ही मिला रहता है । उसे अलग करना पड़े ही नहीं, वह मिला ही हुआ है । जैसे मछली और पानी ।
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कहि जगजीवन राम रस, रसना हरि रस राचि ।
निरबाणी निर्मोह रहै, बिषै बच९ हरि रचि ॥६७॥
(९. बिषै बच=विषय भोगों से बचता हुआ)
जीभ को राम-रस में, हरि-रस में रंग लो । वाणी से परे होकर, मोह रहित होकर, विषयों से बचते हुए हरि में ही रच जाओ ।
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दीरघ बुधि१० दीरघ भजन, दीरघ भगति प्रकास ।
ते मन ते तन ते सबद, सु कहि जगजीवनदास ॥६८॥
(१०. दीरघ बुधि=विशाल बुद्धि)
जिसकी बुद्धि विशाल है, उसका भजन भी बड़ा है और उसकी भक्ति का प्रकाश भी दीर्घ है । वह मन से, तन से और शब्द से एक ही हो जाता है ।
(क्रमशः)

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