गुरुवार, 15 अक्टूबर 2026

४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ९/१२

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ९/१२
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असम५ अंस उतपति अनल, सुलभा६ निरखि समाइ ।
कहि जगजीवन ऊबरै, रांम रिदै ल्यौ लाइ ॥९॥
{५. असम=अश्म(पत्थर) के अन्दर से अग्नि(अनल) उत्पन्न होती है}   (६. सुलभा=आसानी से मिल जाती है) 
पत्थर से भी अंश निकलता है, अग्नि उत्पन्न होती है, जो सुलभ हो कर उसी में समा जाती है । संत जगजीवनदास जी कहते हैं कि वैसे ही यदि राम को हृदय में लौ लगा कर रखो तो जीव मुक्त हो जाता है, उबर जाता है ।
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कोई बंदै७ चंद्रमा, कोई बंदै सूर ।
हरिजन बंदै एक हरि, जगजीवन निज नूर ॥१०॥
(७. बंदै=प्रणाम करना)
कोई चंद्रमा को पूजता है, कोई सूरज को पूजता है । पर सच्चा हरिजन तो एक हरि को ही भजता है । संत जगजीवनदास जी कहते हैं कि वही हरि ही अपना निज नूर है, अपना प्रकाश है ।
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जिन जिन का जे इष्ट है, तिन कौं तिन की मांन८ ।
कह जगजीवन रांम उपासक, दूजी करै न कांन९ ॥११॥
(८. मांन=मर्यादा)    (९. कांन=संकोच)
जिसका जो इष्ट है, उसे वही मान्य है । संत जगजीवनदास जी कहते हैं कि जो राम का उपासक है, वह दूसरी किसी बात पर कान नहीं देता, वह एकनिष्ठ रहता है ।
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मुख* ना मांथौ सबद कै, गूंगी बांणी ग्यांन ।
कहि जगजीवन रांम तजि, इष्ट कथैं जे आंन* ॥१२॥
(*-*. जो उपदेशक राम के अतिरिक्त अन्य देवता की उपासना का उपदेश करते हैं उन की बातों में न शिर है न पैर और न उनकी वाणी में सार है ॥१२॥)
जो राम को छोड़ कर दूसरे को इष्ट बताते हैं, उनके शब्द का कोई मुख नहीं, कोई सिर नहीं है, वह गूंगी वाणी जैसा अज्ञान है । संत जगजीवनदास जी कहते हैं कि राम को छोड़ कर आन इष्ट की बात करना व्यर्थ है ।
(क्रमशः)

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