शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026

४९. भ्रम विधवंस कौ अंग १३/१६

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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४९. भ्रम विधवंस कौ अंग १३/१६
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तीरथाटन१० फल भोगं, सह्कामं सर्वदा दुखं ।
कहि जगजीवन रांम नांमं, निष्कामं त्रिवृति सुखं ॥१३॥
(१०. तीरथाटन=तीर्थयात्रा) 
तीर्थों में घूमने-फिरने का फल सिर्फ भोग मिलना है, और कामना रखकर किया गया कोई भी काम सदा दुख ही देता है । संत जगजीवन जी कहते हैं कि इसलिए राम नाम को बिना किसी कामना के जपना चाहिए, क्योंकि निष्काम राम नाम जपने से तीनों प्रकार के ताप मिट जाते हैं और सच्चा सुख मिल जाता है ।
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मथुरा गंगा गोमती, कहा पखालै१ अंग ।
जगजीवन हरि नांम का, जो नहिं लाया रंग ॥१४॥ 
(१. पखालै=धोवे, स्वच्छ करे)
मथुरा, गंगा, गोमती में जाकर शरीर को धोने से क्या होगा, अगर मन पर हरि नाम का रंग ही नहीं चढ़ा । संत जगजीवन जी कहते हैं कि जैसे कपड़ा केवल पानी में डुबोने से नहीं रंगता, उसे रंग में डुबोना पड़ता है, वैसे ही बाहर के पानी से मन का मैल नहीं धुलता, मन तो हरि नाम के प्रेम के रंग से ही पवित्र होता है ।
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मांही मथुरा परसिये, मांही केसौ राइ ।
बाहर टापा२ दीन कूं, जगजीवन जिन जाइ ॥१५॥
(२. टापा दीन कूं=उछल कूद करने के लिये)
असली मथुरा अपने भीतर ही है, उसी को परस करो जी, और केशव राय यानी कृष्ण भी अपने भीतर ही बैठे हैं । बाहर दौड़-भाग करना तो केवल दीनता और भटकाव है, संत जगजीवन जी ज्ञानी जन इसलिए बाहर नहीं जाता, वह भीतर ही सब तीर्थों को पा लेता है ।
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घट मंहि मथुरा परसिये, घट मंहि गंगतरंग । 
जगजीवन घट खोजतां, नख सिख लागै रंग ॥१६॥
घट के भीतर ही मथुरा का दर्शन होता है, और घट के भीतर ही गंगा की तरंगें बह रही हैं । संत जगजीवन जी कहते हैं कि जब साधक बाहर नहीं, अपने ही घट को खोजता है, अंतर्मुख होता है, तब उसका नख से शिख तक पूरा शरीर हरि के प्रेम के रंग में रंग जाता है ।
(क्रमशः)

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