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🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*समता के घर सहज में, दादू दुविध्या नांहि ।*
*सांई समर्थ सब किया, समझि देख मन मांहि ॥*
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फिर श्यामदास चौड़का भालाना(जयपुर के पास जहां अब दुर्गापुरा है उसके पास) में आकर भजन करने लगे थे और वहां ही अपना साधन धाम बना लिया था । एक समय इनके भक्तों ने भालाना में संत सम्मेलन भी करवाया था । उसमें दादूजी के अनेक शिष्य प्रशिष्य तथा अन्य संत भी पधारे थे । टहटड़ा से नागर निजामजी भी पधारे थे ।
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भोजन के समय जब नागर निजामजी को पंक्ति में पधारने को कहा तब उन्होंने कहा - हम तो दादूजी महाराज के दिये हुये सिद्ध पात्र में आया हुआ भोजन ही पाते हैं, पंक्ति में नहीं आयेंगे । फिर उन्होंने प्रतिदिन के समान भोजन के समय पात्र रखा किन्तु उसमें आज भोजन नहीं आया । कारण-दादूजी महाराज की आज्ञा केवल टहटड़ा ग्राम में रह कर भजन करोगे तो तुमको इस पात्र में भोजन मिल जाया करेगा । किन्तु आज तो टहटड़ा न होकर चौड़का भालाना था ।
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भोजन नहीं आया तब नागरजी ने कहा -
“नागर कहै निजाम से, चड़ो टहटड़े ग्राम ।
टूक मिले टापां मिटे, खाय भजें नित राम ॥”
उक्त संत सम्मेलन से ज्ञात होता है इनके ऊपर भालाणा के आस-पास की जनता का भी इनके भजन द्वारा इन पर अच्छा भाव था । भक्तमाल में श्यामदासजी का नाम मात्र ही दिया है विशेष चरित्र नहीं दिया है ।
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“भालाणा में श्यामदास” मू. ५६५ भक्तमाल के मूल छप्पय ६५८ में- “श्यामदास के राघव पुनि कल्याणे आंहीं ।” अर्थात श्यामदासजी के दो शिष्य थे- राघवदासजी और कल्याणदासजी । इन श्यामदासजी की समाधि दुर्गापुरा(जयपुर) के पास चौड़के भालाणा में नदी के किनारे पर थी । एक तिबारा तथा चरण चौकियां भी थीं । इससे अधिक श्यामदासजी का व उनकी परंपरा का परिचय नहीं मिल सका । अतः प्राप्त हो सका वही यहां लिख दिया गया है ।
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*बड़े सुन्दरदासजी*
मू. छप्पय-
गुरु दादू बड़ शिष्य भयो, लघु नृप बीकानेर को ॥
बादशाह कर हुकुम, पठायो काबुल जाई ।
युध कर घावां पड़चो, समभ किन लियो उठाई ॥
ताजा¹ हो राठौड़ तुरी² चढ़ मथुरा आया ।
मिल्यो देश को लोग, सती समचार सुनाया ॥
राघव, मिल चतुरे कहा, मग ले सांभर शहर को ।
गुरु दादू बड़ शिष्य भयो, लघु नृप बीकानेर को ॥४८४॥
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राघवदासजी ने अपनी भक्तमाल में ४८४ के मूल छप्पय में भीमराजज का संक्षिप्त परिचय दिया है । इस कवित्त की गद्य टीका में विदासर नरेश भीमसिंह सुन्दरदास हुये, वह गलत है । इतिहास का पूरा ज्ञान न होने से तथा भक्तमाल पढ़ाने वालों के कहने से व जनश्रुति के आधार पर वह गलती हो गई है । बड़े सुन्दरदासजी का पूर्वाश्रम का नाम भीमराज था ।
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बीकानेर के राजा जैतसिंह का विवाह अमरकोट के राजा जैतपाल की पुत्री कश्मीरदे से हुआ था । कश्मीरदे के जैतसिंह से पांच पुत्र हुये थे- १- कल्याणमल २- भीमराज ३- ठाकुरसी ४- मालदे ५- कान्हा । इनमें द्वितीय पुत्र भीमराज ही दादूजी के शिष्य बड़े सुन्दरदास हुये थे । भीमराज का जन्म वि. सं. १५७९ फागुण सुदि २ गुरुवार को हुआ था ।
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भीमराज जब युवा हुये तब उनकी वीरता तथा सुन्दरता की ख्याति दूर दूर तक फैल गई थी । इससे उनके विवाह के लिये अनेक राजवंशों ने वार्ता की किन्तु भीमराज का विचार भगवद् भक्ति करने का था अतः वे विवाह नहीं करना चाहते थे । अंत में माता-पिता के आग्रह से उन्हें विवाह करना स्वीकार करना ही पड़ा । फिर महाराणा उदयसिंह की छोटी बहिन राजकुंवरी के साथ भीमराज का विवाह वि. सं. १५९८ में हो गया । राजकुंवरी से भीमराज के एक पुत्र हुआ । जिसका नाम नारायणदास था ।
(क्रमशः)

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