शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026

*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ६५/६८*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
.
*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ६५/६८*
.
*नांम सुमिरि रांमहि मिलै, बिरह अगनि तन दाग१ ।*
*कहि जगजीवन सहज घरि, रहै रांम सूं लाग ॥६५॥*
{१. दाग=जला कर(निवीर्य कर)}
संत जगजीवन साहेब कहते हैं, राम नाम को सुमिरने से ही राम मिलते हैं, पर सुमिरन ऐसा हो कि बिरह की अग्नि में यह शरीर दग्ध हो जाए, अर्थात विषय-वासनाएं जल जाएं । जब तन की वासना जल जाती है, तब जीव सहज घर में, अपने आत्म-स्वरूप में स्थिर होकर राम में लगा रहता है ।
.
*बेद२ बचन प्रतिपाल करि, रांम बिसरि बिष खाइ२ ।*
*कहि जगजीवन जगतगुर, ते क्यौं परसैं आइ ॥६६॥*
(२=२. वेदों के कथनानुसार चलना तो, रांम भजन को त्याग कर विष खा कर श्री को नष्ट करने के समान है)
आपने स्वयं इसका सुंदर अर्थ लिखा है, कि केवल वेद के वचनों का पालन करते रहना और राम भजन को छोड़ देना, यह विष खाकर अपनी आत्मा को नष्ट करने के समान है । संत जगजीवन दास जी कहते हैं, ऐसे लोग जो राम को भूल कर केवल कर्मकांड में लगे हैं, वे जगतगुरु परमात्मा को कैसे छू पाएंगे, अर्थात कैसे प्राप्त कर पाएंगे ।
.
*बेद बचन प्रतिपाल करि, प्रीतिरत मगन सरीर ।* 
*कहि जगजीवन उभै मधि, हरि भजि किया न सीर ॥६७॥*  
कोई वेद के वचनों का पालन करने में लगा है, तो कोई प्रीति में रत होकर शरीर के सुख में मगन है । संत जगजीवन साहेब कहते हैं, दोनों के बीच में ही जीव उलझा रह गया, उसने हरि को भज कर अपने जीवन को शीतल, तृप्त और सार्थक नहीं किया । सीर का अर्थ है शीतलता या सार ।
.
*बेद बचन प्रतिपाल करि, अगम ठौर गम३ नांहि ।* 
*कहि जगजीवन रांम तजि, भूलि रहै भ्रम मांहि ॥६८॥* 
(३. गम=गति)
केवल वेद-वचनों का पालन करने से उस अगम ठौर तक गति नहीं होती, वहाँ पहुँच नहीं होती । जगजीवन दास जी कहते हैं, राम को छोड़ कर जीव भ्रम में ही भूला भटका रहता है । वेद राह बताते हैं, पर मंजिल तो राम भजन से ही मिलती है ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें