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🌷*卐 श्री दादूदयालवे नम: 卐*🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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*दादू साधन सब किया, जब उनमन लागा मन ।*
*दादू सुस्थिर आत्मा, यों जुग जुग जीवैं जन ॥*
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*मोतीदासजी*
घाटड़े की शाखा रूप स्थान बलदेवगढ़ के बावड़ी वाले स्थान के साधु मोतीदासजी को एक दिन एक गुप्त संत के दर्शन होने से सहसा वैराग्य हो गया । तब उन्होंने अपने भाई हनुमानदासजी को कहा— अब मैं सब कुछ छोड़कर एकान्त स्थान में ही बैठूंगा । फिर वे ग्राम के स्थान के एक कमरे में प्रविष्ट हो गये । अपनी शरीर संबंधी सभी क्रिया वहां ही करते थे । किसी से विशेष बात नहीं करते थे निरंतर भजन ही करते थे । कोई उनके पास आ भी जाता तो कह देते थे ‘दादूराम करो ।’ उक्त प्रकार उनका कार्यक्रम निर्विघ्न १४ वर्ष चलता रहा ।
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फिर उन्होंने अपने साधन धाम पर एक सत्संग सम्मेलन करवाया । संतों के भजन बोलने वाले संतों को निमंत्रण देकर बुलवाये । भक्तों को भी सत्संग सम्मेलन की सूचना दी । रात्रि को बहुत अच्छा जागरण हुआ । प्रातः दादूवाणी की पूजा आरती आदि कार्य किये सब के भोजन करने के पश्चात् सब आये हुये संतों को भेंट देकर कहा— अब आपको मेरी यह अन्तिम सत्यराम ही समझ लेना चाहिये । फिर तो मिलन हो या नहीं भी हो, अब मेरा शरीर केवल तीन मास ही रहेगा ।
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संतों ने भी समझ लिया कि भजनानन्दी संत हैं । इनको देहान्त के समय का ज्ञान हो गया है । फिर उन्होंने ठीक तीन मास होने पर वि. सं. २०३१ ज्येष्ठ सुदि ६ को देहत्याग दिया । आप अच्छे भजनानन्दी संत थे । आपकी समाधि बलदेवगढ़ में बावड़ी वाले स्थान में है । श्रद्धालु भक्त आप की समाधि को मानते हैं और भावनानुसार लाभ भी प्राप्त करते हैं । उक्त प्रकार प्रहलाददास जी और उनकी घाटड़ा की शिष्य परम्परा का जो परिचय प्राप्त हो सका है, वह यहां अंकित कर दिया गया है । इति श्री द्वितीय अध्याय समाप्त: २
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*अथ अध्याय ३*
*हरिदासजी(हापा)*
हरिदासजी हापा पूर्वाश्रम में आमेर नरेश भगवतदासजी के छठे पुत्र थे । १- मानसिंह २- माधवसिंह ३-सूरसिंह ४-वनमाली ५-कान्हा ६-हरिसिंह हापा थे । हरिसिंहजी हापाजी के नाम से अधिक प्रसिद्ध थे । जब दादूजी राहोरी पधारे थे तब दादूजी के दर्शन करने हापाजी भी राहोरी गये थे । ऐसा भी उल्लेख कहीं-कहीं मिलता है । ये कूर्मवंशी हापाजी जब बालक थे तब भी इनका व्यवहार वृद्धों के समान था । इन में हंसी करना आदि चपलता तो लेश मात्र भी नहीं थी ।
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फिर ये प्रहलाददासजी के शिष्य होकर हरिदास हो गये थे तब तो गुरुदेव प्रहलाददासजी के उपदेश के अनुसार साधन करके अपने कुल, कर्म, संपत्ति, बल आदि का अभिमान छोड़कर शम दम द्वारा मन इन्द्रियों को रोककर निरंतर हरि स्मरण ही करते रहते थे । इन्होंने गुरुवर प्रहलादजी के द्वारा प्राप्त योग युक्ति से मोक्ष पद को प्राप्त करने का अच्छा प्रयत्न किया था । इन्होंने निरन्तर निदिध्यासन करके ज्ञान प्राप्त कर लिया था । उस ज्ञान से अपने हृदय के अज्ञान को नष्ट करके अपनी वृत्ति को ब्रह्म स्वरूप में ही स्थिर रखते थे । कुछ ही वर्षों में हरिदासजी उच्च कोटि के संत हो गये थे । इन हरिदासजी के सेवक विशेष करके- कछवाहा, खींची, चौहान आदि क्षत्रिय ही अधिक थे ।
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*आमेर पधारना*
शनै: शनै: आपके अनेक शिष्य हो गये थे । ये आमेर नरेश के पुत्र होने पर भी सब भोगों का त्याग करके संत बने थे । अत: उनका वैराग्य साधना और शील स्वभाव आदि को देखकर स्वत: ही लोगों की रुचि इनका सत्संग करने की होती थी । इससे इनके शिष्य तथा अनेक सेवक साथ रहते थे । उस मंडल के सहित ही आप जहां तहां पवित्र स्थानों में भ्रमण करते रहते थे ।
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शिष्य होने के १२ वर्ष पश्चात् भ्रमण करते हुये अपनी जन्म भूमि आमेर के पास आ गये थे । अत: शिष्य मंडल के सहित जन्म भूमि का दर्शन करने आमेर पधारे । दिल्ली दरवाजे के पास के बाग में ठहरे । कथा, कीर्तन, सत्संग होने लगा । नगर की जनता सत्संग का लाभ लेने लगी । उस समय हरिदासजी के शिष्य(भक्त माल के कर्ता) राघवदासजी कथा करते थे ।
“शिष्य प्रशिष्य जन संग बहु, हरि आये आमेर ।
कथा दास राघव करे, सकल ज्ञान धन लेर ॥” वंशदीपिकाप्र. ५।
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फिर आमेर नरेश मानसिंह को ज्ञात हुआ कि-मेरे लघु भ्राता हरिसिंह हापा हरिदास बनने के पश्चात् प्रथम बार ही आमेर में आये हैं तब मानसिंह उनके दर्शन करने बाग गये । पास जाकर प्रणाम की । सत्यराम बोलकर फिर सामने बैठ गये । मानसिंह ने हरिदासजी का त्याग प्रत्यक्ष देखा । वे शरीर आच्छादन के लिये साधारण वस्त्र धारण किये हुये थे । उनके मस्तक पर साधन जन्य ब्रह्मतेज चमक रहा था । वाणी में अति मधुरता थी, स्वभाव परम शांत था, वे निरंतर हरि स्मरण कर रहे थे, प्रत्येक शब्द बोलते थे, तब ॐ हरि, राम आदि ईश्वर के नाम साथ बोलते ही थे । राजा मानसिंह को अपने लघु भ्राता का तप तेज देखकर अति प्रसन्नता हुई ।
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फिर आमेर नरेश मानसिंह ने हरिदासजी को नम्र भाव से प्रार्थना की—भगवन्! कुछ दिन अपने शिष्य मंडल के सहित राजभवन में विराज कर राजभवन के सभी प्राणियों को सत्संग का सुख प्रदान करें । कारण राजभवन की महिलायें यहां आपका सत्संग करने प्रतिदिन नहीं आ सकतीं हैं । आप राजभवन में विराजेंगे तब सभी को प्रतिदिन सत्संग का आनन्द प्राप्त होगा । राज परिवार आपके दर्शनों की इच्छा कर रहा है । अत: आप हम सब पर अनुग्रह करके अवश्य कुछ दिन राजभवन में विराजें ।
(क्रमशः)
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