मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026

*२८. साधु असाधु परीक्षा का अंग ~२५/२७*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२८. साधु असाधु परीक्षा का अंग ~२५/२७*
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*साधु हिरदा शून्य१ सम, मुक्ता२ मल न रहाय ।*
*और सकल उर धर४ मयी३, बहु विधि विघ्न उपाय ॥२५॥*
संत का हृदय आकाश१ के समान है, जैसे आकाश सभी मलों से मुक्त२ रहता है, उसमें मल नहीं रहता वैसे ही संत का हृदय सब पापादि दोषों से रहित है, उसमें कोई भी दोष नहीं रहता और संपूर्ण असंतों का हृदय पृथ्वी४ रूप३ है, जैसे पृथ्वी विविध प्रकार के उपायों से मैली होती रहती है, वैसे ही असंतों के हृदय बहुत प्रकार के दोष रूप विघ्नों से मलीन होते रहते हैं ।
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*संसारी१ राकेश२ उर, झाँई३ दर्शे माँहिं ।*
*साधु दिल सूरजमयी४, प्रतिविम्ब पड़े सुनाँहि ॥२६॥*
असंत१ का हृदय चन्द्रमा२ के समान है, जैसे चन्द्रमा में पृथ्वी की छाया३ पड़ती है, वैसे ही असाधु के हृदय में विषयों की छाया पड़ती है, अर्थात विषयाशा रहती है । संत का हृदय सूर्य-रूप४ है, जैसे सूर्य पृथ्वी का प्रति-बिम्ब नहीं पड़ता है वैसे ही संत के हृदय में विषयाशा नहीं रहती । यही संत -असंत की परीक्षा है ।
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*दर्पण में दीपक दर्शे, दीवे दर्पण नाँहिं ।*
*यूं संसारी१ अरु साधु के, व्यौरा२ उरहु सु माँहिं ॥२७॥*
दर्पण में दीपक का प्रतिबिम्ब दिखता है, किन्तु दीपक में दर्पण का प्रतिबिम्ब नहीं दिखता, वैसे ही असाधु१ के हृदय में तो विषयाशा भासती है किन्तु साधु के हृदय में नहीं भासती । यही उनके हृदय का समाचार२ है ।
(क्रमशः)

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