शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026

*३१. साधु संगति परम लाभ का अंग ~१३/१६*

*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*३१. साधु संगति परम लाभ का अंग ~१३/१६*
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*तन मन सिमटे सहज ही, जो सत्संगति होय ।*
*जन रज्जब दृष्टांत को, बेली लजालू जोय ॥१३॥*
देखो ! दृष्टान्त के लिये लाजवन्ती की बेलि, जैसे लाजवन्ती मनुष्य के हाथ पड़ने से संकुचित हो जाती है, वैसे ही सत्संग से प्राणी के तन तथा मन विषय-विस्तार को त्याग कर प्रभु में स्थिर हो जाते हैं, तन ब्रह्म स्वरूप सन्तों की सेवा में और मन निरंतर ब्रह्म चिन्तन में ही स्थिर रहता है ।
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*साधु चन्दन बैन वास तैं, कुल काष्ट गये रोग ।*
*रज्जब देखहु देखते, भये देव गति जोग ॥१४॥*
देखो ! चन्दन की सुगन्ध से काष्ट का कुल परम्परागत दुर्गंध रूप से नष्ट होकर वह देखते देखते ही देवताओं के पास जाकर उनकी पूजा के योग्य हो जाता है, वैसे ही सन्तों के वचनों की श्रवण करने से प्राणी का कुल परम्परागत हीन जाति रूप रोग देखते देखते ही नष्ट होकर वह ब्रह्म प्राप्ति के योग्य हो जाता है ।
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*रज्जब पलटे जीव सुध१, साधु संगति आय ।*
*पारस लोहा पहुप२ तिल, स्त्रक३ चन्दन वन राय४ ॥१५॥*
जैसे पारस से लोहा सुवर्ण रूप में, पुष्पों२ से तिल तैल सुगन्ध रूप में, निर्गंध पुष्प - माला३ चन्दन से इत्र सुगन्ध रूप में और चन्दन वृक्ष से वन पंक्ति४ के वृक्ष चन्दन रूप में बदल जाते हैं, वैसे ही सरल१ स्वभाव वाले साधारण जीव भी साधु संगति में आकर संत रूप में बदल जाते हैं ।
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*स्वर्ग नसीनी१ जगत जहाज, दीर्ध दुर्भिक्ष२ में ज्यों नाज ।*
*दुख की दारू३ जीवन जड़ी४, रज्जब साधु समागम घड़ी ॥१६॥*
संतों के समागम की घड़ी, स्वर्ग में चढ़ने के लिये सीढी१, संसार सागर से तिरने के लिये जहाज, महान दुष्काल२ के कष्ट से बचने के लिये अन्न, रोग से बचने के लिये औषधि३, जीवन को सुरक्षित रखने के लिये रसायन बूंटी४ रूप है ।
(क्रमशः)

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