*🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏*
*🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷*
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*२८. साधु असाधु परीक्षा का अंग ~९/१२*
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*रज्जब सोना शैल१ सुत, तुले बराबर तोल ।*
*तो कुछ आघन एक ह्वै, लहै न समसरि मोल ॥९॥*
सोना और पर्वत१ का पुत्र पत्थर तुला में तोल में बराबर तुलने पर भी पत्थर का आदर सोने के समान नहीं होता और न सोने के समान पत्थर का मूल्य मिलता, वैसे ही साधु-असाधु के शरीर भेष के द्वारा समान दीखने पर भी असाधु साधु के समान नहीं हो सकता ।
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*दोय भाव के दो पले, तुला हाथ हरि माँहिं ।*
*जड़ चेतन सुत तहँ चढे, मोल एक सो नाँहिं ॥१०॥*
दो प्रकार की भावना वाले दो पलङों वाला तुला हरि के हाथ में है, असाधु भावना वाले पलड़े पर जड़ बाट के समान असाधु पुत्र चढ़ता है और साधु भावना वाले पलड़े पर चेतन पदार्थ अर्थात ज्ञानी साधु पुत्र चढ़ता है उन दोनों का मूल्य एक नहीं हो सकता, अर्थात हरि के पास साधु की समता असाधु नहीं कर सकता ।
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*वस्तु बाट दोऊ तुलहिं, लिपैं छिपैं सो नाँहिं ।*
*रज्जब कही विचार कर, ताको१ तुला सु माँहिं ॥११॥*
तुला में देखो१, वस्तु और बाट दोनों तुल रहे हैं, वे किसी प्रकार छिपते नहीं, कारण वस्तु युक्त है और बाट गुण हीन है, वैसे ही हमने भी विचार करके ही कहा कि साधु दैवी गुण युक्त है, असाधु शुभ गुण हीन है, अत: साधु अपने गुण के कारण न तो किसी में लिपायमान होता और न असाधुओं से छिपता है ।
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*प्राण पले१ है प्राण-पति, पिंड पले सु पषान२ ।*
*भाव भार भेला३ तुला, विगता४ वस्तु बखान५ ॥१२॥*
विवेक रूप तुला का एक पलड़ा तो प्राणी रूप है और दूसरा शरीर रूप है, प्राणी रूप पलड़े१ प्राणपति-परमात्मा रूप वस्तु है और शरीर रूप पलड़े में बाट का पत्थर२ है, प्राणी का परमात्मा में जो भाव बाट का भार साथ३ तुल रहे हैं, अर्थात दोनों पलड़े बराबर हैं, किन्तु जिस मनुष्य को परमात्मा-रूप वस्तु का यथार्थ ज्ञान हो गया है वह परमात्मरूप वस्तु को बाट से अधिक समझता है और ज्ञानी४ संत कहा५ जाता है, बराबर समझता है वही अज्ञानी और असंत कहा जाता है ।
(क्रमशः)

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