मंगलवार, 3 नवंबर 2026

*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ८१/८४*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*#पं०श्रीजगजीवनदासजीकीअनभैवाणी*
*श्रद्धेय श्री Tapasvi @Ram Gopal Das की प्रेरणा से*
*वाणी-अर्थ सौजन्य ~ Meta AI*
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*४९. भ्रम विधवंस कौ अंग ८१/८४*
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*आतम अस्थल रांमजी, डिगै न कबहूं मंड ।*
*कहि जगजीवन नांम भजि, निरखि नूर नौ खंड ॥८१॥*
आत्मा रूपी अस्थल में राम जी विराजते हैं, वह अस्थल कभी डगमगाता नहीं, कभी नष्ट नहीं होता । संत जगजीवन दास जी कहते हैं, तू नाम को भज, तो तुझे नौ खंडों में, सारे ब्रह्मांड में उसी नूर का दर्शन होगा । वह एक ही नूर सब जगह रमा है ।
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*कहि जगजीवन सक्ति करि, अस्थल अडिग करंत ।*
*रांम बिमुख देही डिगी, अंबुज अंबु भरंत ॥८२॥*
संत जगजीवन साहेब कहते हैं, शक्ति के द्वारा इस अस्थल को अडिग किया जाता है, साधना की शक्ति से आत्मा स्थिर होती है । जो राम से विमुख है, उसकी देह डिग जाती है, नष्ट हो जाती है, जैसे कमल का पत्ता जल भरते ही डूब जाता है । अंबुज=कमल, अंबु=जल ।
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*कहि जगजीवन निरजला, लोक करै यौं नांहि ।*
*हरि जन राखै ते सही, रांम भगति ब्रत मांहि ॥८३॥*
संत जगजीवन साहेब निर्जला व्रत के बारे में कहते हैं, लोक जिस प्रकार निर्जला करता है, केवल अन्न-जल त्याग कर, वह सच्चा निर्जला नहीं है । सच्चा निर्जला तो वह है जो हरि जन रखते हैं, अर्थात राम भक्ति के व्रत में स्थित रहना, विषयों से निर्जल रहना, वही सही निर्जला है ।
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*कहि जगजीवन निरजला,अन्न उदिक की आड़ ।*
*हरि तजि चित भ्रम दूसरा, मनसा लाड़ै लाड़ ॥८४॥*
कई लोग निर्जला का बहाना बनाते हैं, अन्न-जल की आड़ लेते हैं, पर चित्त में हरि को छोड़ कर दूसरे भ्रम में लगे रहते हैं । मनसा लाड़ै लाड़ का अर्थ है मन में तरह-तरह के लाड़, लाड-प्यार, विषयों की चाह में लिप्त रहना । संत जगजीवन साहेब कहते हैं, बाहर से अन्न-जल त्यागा और भीतर मन विषयों में लिपटा रहा, तो वह निर्जला किस काम का ।
(क्रमशः)

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