मंगलवार, 27 नवंबर 2012

= परिचय का अंग =(४/१५४-६)


॥ दादूराम-सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"* 
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज 
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*= परिचय का अंग - ४ =*
*दादू जब लग असथल देह का, तब लग सब व्यापै ।*
*निर्भय असथल आत्मा, आगै रस आपै ॥१५४॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जब तक शरीर अध्यास का भाव रहता है, तब तक हर्ष - शोक, राग - द्वेष, शीत - उष्ण, आदिक द्वन्द्वभाव भासता है और जब समाधि अवस्था में चित्त वृत्ति - आत्म परायण होती है, उस समय सब द्वन्दों से निर्भय होते हैं । जब सुरति में इतनी एकाग्रता हुई कि अनात्म द्वैतभाव को भूलकर केवल ब्रह्म में ही अभेद हो गई तो, मुक्तजन जीवत्व के भ्रम को बिसार कर केवल ब्रह्म रूप ही हो जाते हैं ॥१५४॥ 
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*जब नांही सुरति शरीर की, बिसरै सब संसार ।*
*आतम न जाणैं आप को, तब एक रह्या निरधार ॥१५५॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जब मुक्तपुरुषों को अपने शरीर की सुधि नहीं रहती है, तब वे समस्त संसार की वासनाओं से मुक्त हो जाते हैं । और तो क्या कहें ? जब आत्मा अपने जीवत्वभाव को भी बिसर जाता है, तो उस समय अधिष्ठान ब्रह्म स्वरूप ही हो जाता है ॥१५५॥ 
रोयां राज न पाइये, होडूं बड़ा न होइ । 
दादू दई निवाजिया, "खोजी" रोस करो मत कोई ॥ 
शिव शेष सम जानियो, दादूदास कलि मांहिं । 
"खोजी" वाके भजन को, दूसर पूगै नांहि ॥ 
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*तन सौं सुमिरण कीजिये, जब लग तन नीका ।*
*आत्म सुमिरण ऊपजै, तब लागै फीका ॥* 
*आगै आपैं आप है, तहाँ क्या जी का ।*
*दादू दूजा कहन को, नाहीं लघु टीका ॥१५६॥* 
टीका - हे जिज्ञासुओं ! जब तक स्मरण में मन की एकाग्रता नहीं होती है, तब तक शरीर से ही स्मरण करना उत्तम है । परन्तु निरन्तर अभ्यास के द्वारा मन की एकाग्रता होने से समस्त वृत्तियों की आत्मा में स्थिरता होगी । इसके बाद जब ब्रह्म में वृत्ति लयलीन होगी तो, अपने आप एक चैतन्य ही शेष रहता है । वहाँ पर फिर जीव का परिछिन्न जीवभाव भी विलीन हो जाता है । कहने को भी छोटा बड़ा भाव नहीं फुरता है, अद्वितीय ब्रह्मभाव ही व्याप्त रहता है ॥१५६॥ 
साधन अब कहा होत है, नैनन राखौं मूंद । 
पियहिचितवन चित्त यों, ज्यूं बालू में बूँद ॥ 
(क्रमशः)

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