॥ दादूराम-सत्यराम ॥
*"श्री दादूदयाल वाणी(आत्म-दर्शन)"*
टीका ~ महामण्डलेश्वर ब्रह्मनिष्ठ पंडित श्री स्वामी भूरादास जी
साभार विद्युत संस्करण ~ गुरुवर्य महामंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमाराम जी महाराज
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*= परिचय का अंग - ४ =*
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*सुरति रूप शरीर का, पीव के परसे होइ ।*
*दादू तन मन एक रस, सुमिरण कहिये सोइ ॥१६३॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! भगवान् का साक्षात्कार होने पर शरीर का परिमाण केवल सुरतिरूप ही रह जाता है । उस समय केवल ब्रह्माकार सुरति ही शेष रहती है, अन्य शरीर आदिक कुछ नहीं प्रतीत होते । इस रीति से जब तन - मन आदिक की परमेश्वर में एकता हो जाए, तब समझिए कि परमेश्वर का स्मरण करना सार्थक है ॥१६३॥
दादूदास, कबीर जी, पीपो जी पुनि सोइ ।
जहाज तिरी पंडो जीयो, चन्दवो प्रत्यक्ष जोइ ॥
दृष्टान्त - ब्रह्मऋषि दादूदयाल जिस समय आमेर में निवास करते थे, सात सौ साहूकारों की एक जहाज एक समुद्र में रुक गई । उन्होंने अपने - अपने देवी देवताओं को याद किया । जहाज नहीं उबरी । तब एक साहूकार ने हिंगोल गिरी और कपिल मुनि, इन दोनों महात्माओं की आराधना की । ये दोनों जहाज में प्रकट हो गए । साहूकारों ने नमस्कार किया और कहा - "महाराज ! बचाओ ।" उन्होंने जहाज के एक डंडा मारा और बोले - "चल ।" तो और ज्यादा वह जहाज पानी में डूबने लगी । तब उन्होंने ध्यान धर कर देखा और बोले - "आप लोग जहाज के ऊपर चढ कर, 'दादू दादू' करो, तभी जहाज तिरेगा ।" वैसा ही सभी ने किया । यह आर्त पुकार आमेर में गुरुदेव ने सुनी और सुरतिरूपी शरीर से वहीं पहुँच गए और समुद्र में अपना हाथ डालकर जहाज को उबारा और बोले, "राम जी महाराज ! जहाज को पार लगाओ ।" जहाज चल पड़ा ।
राम संभालिये रे, विषम दुहेली बार ॥ टेक ॥
मंझ समंदा नावरी रे, बूडे खेवट - बाज ।
काढ़नहारा को नहीं, एक राम बिन आज ॥(राग गौड़ी - १३)
छन्द -
सात सौ साहूकार, सात करोड़ माल भर्यो,
सिन्धु बिच आय कर, जहाज अड़ गई है ।
हिंगोल कपिल मुनि, दादू जी को ध्यान धर्यो ।
सब मिल टेर करी, सागर पार भई है ॥
इस प्रकार फिर नन्द आदि साहूकार दोनों संतों के साथ आमेर में आकर गुरुदेव के दर्शन किए और पूर्वोक्त सारा वृत्तान्त राजा मानसिंह के दरबार में साहूकारों ने सुनाया ।
द्वितीय दृष्टान्त - इसी प्रकार कबीर जी महाराज एक समय काशी में अपनी निन्दा कराने के लिए वैश्या को साथ लेकर राजा डूंगर सिंह के दरबार में पहुँचे । राजा के सहित दरबार में सभी लोगों ने उनको देखा और बोले - कबीर, ये क्या रूप बनाया ? उनके हाथ में एक बोतल थी, एक प्याला था । बोतल में तो गंगाजल था, परन्तु लोगों को दृढाने के लिए मतवाले का रूप बना रखा था । उसी समय बोतल को डाल दिया, प्याले को गिरा दिया और एक हाथ दूसरे हाथ पर मार कर बोले - बुझाओ ! बुझाओ ! जल गया । लोगों ने पूछा - कबीर ये क्या अफंडबाजी कर रहा है ? कबीर जी बोले - अफंडबाजी क्या है ? जगन्नाथपुरी में एक पंडा रसोई घर में चुल्हे पर से एक बर्तन उतारता था, उसकी बांह में आग लग गई । वह तो मैंने बुझा दिया, नहीं तो वह जल जाता । यह कहकर अपने आश्रम पर चले आए और वैश्या को उसके घर भेज दिया । दुनियां से कबीर जी ने अपना पीछा छुड़ा लिया । राजा ने यह बात सुनकर रानी को महलों में जाकर बतलाई । रानी बोली - आपने उनमें से कुछ श्रद्धा तो नहीं हटा ली है । राजा बोले - मैंने उन को नमस्कार वगैरा नहीं किया । रानी ने कहा - अपने तो गुरु हैं, अपने तो ईश्वर हैं, आपने यह अच्छा नहीं किया । संतों की गति कौन जान पाता है ? रानी के कहने के अनुसार राजा ने जगन्नाथपुरी से खबर मंगवाई । पता चला उस रोज कबीर जी अमुक समय जगन्नाथपुरी में मौजूद थे और पंडे के जलते हुए हाथ को बचाया । स्थूल शरीर से काशी में थे और सुरतिरूपी शरीर से जगन्नाथपुरी में थे ।
तृतीय दृष्टान्त - भक्त पीपा जी महाराज, रायसिंह में राजा शूरसेन के दरबार में एकादशी के जागरण में बैठे थे । आधी रात्रि का समय हुआ । एक दम ध्यान से उठे और बोले - "बुझाओ ! बुझाओ !' राजा के सहित सब लोगों ने प्रार्थना की कि महाराज ! क्या हो गया ? महाराज पीपा जी बोले - भाई द्वारका में भगवान् कृष्ण रास कर रहे थे । एक सखी के हाथ में जलती हुई मसाल थी । जब भगवान् नृत्य करने लगे, सखी का हाथ जरा ऊँचा हो गया । ऊपर जरी का शामियाना लगा हुआ था । उसमें मसाल की झल से आग लग गई । वह तो मैंने अचानक बुझा दिया, नहीं तो कई हजार का नुकसान हो जाता । यह सुनकर राजा के सहित सभी लोगों ने आश्चर्य किया, परन्तु जब राजा ने द्वारका से पता करवाया तो बात सही हुई कि महाराज पीपा जी उस रात रास देख रहे थे । उन्होंने जरी के शामियाने को जलने से बचाया । राजा यह समाचार सुनकर महाराज के चरणों में जाकर नमस्कार किया और मन में समझ गया कि पीपा जी स्थूल शरीर से जागरण में थे और सुरति रूपी शरीर से रास देखते थे । परमेश्वर के नाम स्मरण में यह शक्ति है कि भक्त लोग दो - दो रूप भी बना लेते हैं ।
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*राम कहत राम ही रह्या, आप विसर्जन होइ ।*
*मन पवना पंचों विलै, दादू सुमिरण सोइ ॥१६४॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! यही सार्थक स्मरण है, जो कि अन्तःकरण में होता है । उसी चिन्तन से मन, प्राण, पंच इन्द्रियों आदिक का चैतन्य में विलय होता है और मलीन, अहंत्व आदिक भाव विसर कर मुमुक्षु केवल ब्रह्मरूप ही हो जाता है ॥१६४॥
तूँ तूँ करता तूँ रह्या मुझ में रही न हूँ ।
वारी फेरी बलि गई, जित देखूँ तित तूँ ॥
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*जहँ आतम राम संभालिये, तहँ दूजा नांही और ।*
*देही आगे अगम है, दादू सूक्ष्म ठौर ॥१६५॥*
टीका - हे जिज्ञासुओं ! हृदय - प्रदेश में आत्मारूप राम का स्मरण करने से द्वैतभाव वहाँ पर नहीं रहता और "देही" कहिए, जीव के आगे अन्तःकरण में ही साक्षीरूप राम है परन्तु जानने का मार्ग बारीक है । अथवा साधारण जीवों से ब्रह्मा जो सूक्ष्म है, उसका स्मरण करना कठिन है, क्योंकि जीव बहिरंग वृत्तिवाला है ॥१६५॥
(क्रमशः)

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